Wednesday, August 24, 2011

‘तपस्विनी’ काव्य चतुर्थ सर्ग- हरेकृष्ण मेहेर (Hindi Tapasvini Canto-4)

TAPASVINI Original Oriya Epic Poem
By : Poet Gangadhara Meher (1862-1924)   
Complete Hindi Translation by : Dr. Harekrishna Meher
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Tapasvini [Canto-4]
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[Canto-4 has been taken from pages 78-89 of my Hindi ‘Tapasvini’ Book
Published by : 

Sambalpur University, Jyoti Vihar, Sambalpur, Orissa, First Edition : 2000.] 
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For Introduction, please see : Tapasvini : Ek Parichaya ' 

Link :
http://hkmeher.blogspot.com/2008/07/tapasvini-ek-parichaya-harekrishna_27.html
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‘तपस्विनी’ महाकाव्य    
मूल ओड़िआ रचना : स्वभावकवि गंगाधर मेहेर (१८६२-१९२४)
सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर   

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चतुर्थ सर्ग
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समंगल आई सुन्दरी
प्रफुल्ल-नीरज-नयना उषा,
हृदय में ले गहरी
जानकी-दर्शन की तृषा ।
नीहार-मोती उपहार लाकर पल्लव-कर में,
सती-कुटीर के बाहर
आंगन में खड़ी होकर
बोली कोकिल-स्वर में :
‘दर्शन दो, सती अरी !
बीती विभावरी ॥’ (१)

अरुणिमा कषाय परिधान,
सुमनों की चमकीली मुस्कान
और प्रशान्त रूप मन में जगाते विश्वास :
आकर कोई योगेश्वरी
बोल मधुर वाणी सान्त्वनाभरी
सारा दुःख मिटाने पास
कर रही हैं आह्वान ।
मानो स्वर्ग से उतर
पधारी हैं धरती पर
करने नया जीवन प्रदान ॥ (२)

गाने लगी बयार
संगीत तैयार ।
वीणा बजाई भ्रमर ने,
सौरभ लगा नृत्य करने
उषा का निदेश मान ।
कुम्भाट भाट हो करने लगा स्तुति गान ।
[1]   

कलिंग आया पट्टमागध बन, [2]   
बोला बिखरा ललित मधुर स्वन :
‘उठो सती-राज्याधीश्वरि !
बीती विभावरी ॥’ (३)

मुनिजनों के वदन से
उच्चरित वेदस्वन से
हो गया व्याप्त श्यामल वनस्थल ।
पार कर व्योम-मण्डल
ऊपर गूँज उठा उदात्त ॐकार ।
मानो सरस्वती की वीणा-झंकार
विष्णु के मन में भर सन्तोष अत्यन्त
पहुँच गयी अनन्त की श्रुति पर्यन्त ।
धीरे-धीरे जगमगा उठा कानन सारा,
जैसे बल बढ़ने लगा मन्त्र द्वारा ॥ (४)

इसी समय सीता के समीप आकर
कहा मञ्जुल मन्द्रस्वर
ब्रह्मचारिणी अनुकम्पा ने :
‘उठो वत्से विदेह-कुमारी !
पधारी है उषा सुकुमारी ।
देकर अपने दर्शन
प्रसन्न करा ले उसका मन
विधि के अनुसार ।
तमसा राह निहार रही सुख पाने
तुझे गोद में बिठा एक बार ॥’ (५)

पद्मिनी-हृदय-गत शिशिर-बूँद में विद्यमान
खरांशु दिनकर के प्रतिबिम्ब समान,
अपने शोक-जर्जर
मानस-फलक पर
वीर राम का आलेख्य करके अंकन
आसन से खड़ी हो गयीं सती-रतन ।
नमन कर अनुकम्पा के पदद्वय,
उषा-चरणों में वन्दना की सविनय ॥ (६)

करके उसकी प्रशंसा रचना
बोलीं सती जानकी :
‘उषादेवी ! दुनिया में प्रदान करती हो सूचना
अन्धकार-ध्वंसी अंशुमान् के आगमन की ।
ज्योतिष्मान् हैं तुम्हारे मृदुल चरण,
उनमें अटल आशा ले जाती हूँ शरण ।
शुभ्र-सौरभ-रसिके अरी !
रघुवंशी पर बनो शुभंकरी ॥’ (७)

तमसा आश्रम-धात्री
पवित्र-स्रोता सुविमल-गात्री,
निशावसान में समुत्सुक-मन
बिछा आंगन में सुमन,
सींच बिन्दु-बिन्दु सुगन्धित उदक,
जला प्रभाती तारा मंगल दीपक,
मीन-नयनों में बारबार
चञ्चल निहार
सती सीता के शुभागमन की सादर
प्रतीक्षा कर रही थी उधर ॥ (८)

तापस-कन्याओं के आदर-वन्या-प्लावन से
विश्व-धन्या सती-शिरोमणि जानकी
सत्वर चलीं आश्रम-सदन से
अनुकम्पा के सहित,
तमसा-स्रोत में अभिलाषा रख स्नान की ।
तमसा ने सती को पाकर त्वरित
गोद में बिठा सदुलार
आलिंगन किया तरंग-बाहें पसार ॥ (९)

सुधा-मधुर स्वन में
सन्तुष्ट-अन्तःकरण
बोली तमसा :
‘आशा नहीं थी माँ ! मेरे मन में,
राजलक्ष्मी-हृदय-हार सीता सती
भोग-पिपासा सब त्याग
मेरी गोद में विहार करेगी सानुराग ।
लोग कहेंगे मुझे भाग्यवती
तेरे ही कारण
संसार में करके मेरी प्रशंसा ॥ (१०)

घूमती फिरती वन-वन में
गण्ड-कुहुक में न उलझ,
कई बाधाएँ करके पार
अपने निर्मल जीवन में,
न दुःख मान अन्धकार,
प्रकाश न सुख समझ
चली हूँ दूर रास्ते नम्र मस्तक ।
जन्म कर रही हूँ सार्थक
नीर-दान से निरन्तर
सभी तटवासियों के मानस में तृप्ति भर ॥ (११)

उन सारे गुणों से हैं भरी
मेरी तरह मन्दाकिनी और गोदावरी ।
[3]   

फिर भी उन्होंने बढ़ाया है गौरव,
पाकर तेरे पावन चरण-चिह्न अक्षय वैभव
और देवत्व-प्रदायक दुर्लभ
शुभांग-सौरभ ।
उन्हें प्राप्त करने मेरी कामना थी,
उनके बिना मैं लाञ्छित-मना थी ॥ (१२)

किया था मैंने शुभ कर्म आचरण,
धर्म ने मेरे समीप इसी कारण
तुझे पहुँचा दिया समय पर
मेरे हृदय की अभिलाषा समझ कर ।
पायी है मैंने दुर्लभ सम्पदा,
प्राप्त करूंगी तृप्ति सदा
प्रत्यह तुझे बुलाकर
अपनी गोद में लाकर ।
हर लेगा तेरा अंग-सौरभ, अरी माँ !
मेरे जीवन की समस्त कालिमा ॥ (१३)

मेरी गोद में केलि करते सरस,
दलबद्ध हंस सारस
चक्रवाक युगल-युगल
साथ बक सकल ।
तेरे पुण्यमय कलेवर के
क्षालन से पवित्र मेरा सलिल पान करके
ये जीवित रहेंगे मेरे पास
रच नित्य निवास ।
यश तेरा गाते रहेंगे
कलरवों के व्याज इधर,
मेरे श्रवणों में जगाते रहेंगे
सन्तोष निरन्तर ॥ (१४)

पतिव्रता-अंग से लगकर
पवित्र करने अपना कलेवर
त्याग वल्लरी-आवास,
वैरागी पुष्प सकल
दूर-दूर से डूब उछल
बहकर दौड़ते रहेंगे,
फिर मँडराते रहेंगे
आकर तेरे पास ।
कृपामयि ! तू स्नान के समय
सलिल में मेरे,
उन्हें हटाएगी नहीं सदय
चरणों से तेरे ॥ (१५)

मेरे तट पर चरण रखकर
तू विहार करेगी माँ ! सुखकर,
उसी व्याज से करेगी देव-द्युति प्रदान ।
पाकर उसे हरियालीभरे वन्य तरुगण
करेंगे देव-दर्प धारण
और शान्ति विधान ।
पल्लवों में पाटल श्यामल सुन्दर
आभा रहेगी निर्मल निरन्तर ॥’ (१६)

सीता बोलीं : ‘ यह नीर कितना निर्मल,
मधुर जैसे नारिकेल-जल ।
है नहीं नीर यही,
साक्षात् माता का क्षीर सही
पर्वत-उरज से प्रवहमान,
मृतप्राया सीता के लिये अमृत-धारा समान ।
ओह ! इस देश में तू तो है मेरी माँ
तमसा का रूप लेकर यहाँ ।
हो गया है विदीर्ण गहरा
मेरे दुःखों से हृदय तेरा ॥ (१७)

तेरा पृष्ठ-भेद हुआ है दरार से,
दूसरा पार्श्व दृश्यमान ।
फिर भी करने कन्या की तुष्टि विधान,
स्नेह-नयन खोल
प्रीतिभरी मीठी वाणी बोल
चाटु करती तू दुलार से ।
माँ ! धन्य-धन्य हृदय तेरा
मेरे दुःख-आतप के लिये सिकताभरा ॥ (१८)

श्रीराम-साम्राज्य में जो सीता
जन-नयनों में दूषिता चिर-निर्वासिता,
वह तेरे विचार में
दिखला अपना पातिव्रत्य-धर्म बल
पवित्र कर सकेगी संसार में
स्थावर जंगम सकल ।
समझती अपनी
पुत्री का दुःख जननी ।
पुत्री यदि वा दग्ध-वदना,
माता के नैनों में भाती चन्द्रानना ॥ (१९)

निश्चित तेरा तट प्यारा
हो चुका मेरा चिरन्तन सहारा ।
भरोसा तेरे शान्तिमय चरण-कमल ।
जिसके लिये शून्य चराचर सकल,
माता की गोद ही उसके लिये महान्
दुनिया में अपार आदरों की खान ।
माता जिसकी रत्नगर्भा धरित्री,
दूसरा स्थान भला क्यों खोजेगी पुत्री ?’ (२०)

तमसा नीर सुनिर्मल
सुशीतल पवित्र,
उस-जैसा मुनिकन्याओं का चरित्र ।
बन गयी उनका स्वरूप अविकल,
स्नेहोत्कण्ठिता तमसा
प्रतिबिम्ब के व्याज सहसा ।
उन्हें आलिंगन कर उत्सुक-मन
मिला दिया उसने तन से तन ॥ (२१)

इस प्रकार पाकर शुभ अवसर
समीप सीता के रहकर,
निरन्तर निहारने के लिये
बुद्धिमती तमसा ने प्राप्त किये
कई शरीरों में कई नयन,
कई हृदय कई मन ।
समान धर्म से समान गुण से मिल
चित्त बहुगूण प्रसन्न रहता खिल ॥ (२२)

स्नान सम्पन्न करने के बाद
लौटकर पूजे वाल्मीकि-चरण सबने,
प्रदान किया शुभाशीर्वाद
प्रसन्न-मन मुनिवर ने :
‘ज्ञान-धनार्जन से करके साधना
प्राप्त करो उत्तम साफल्य अपना ।’
विशेष रूप से सीता से कहा सादर :
‘वत्से ! वीर-प्रसविनी बनो निडर ॥ (२३)

कर ले वत्से ! पुत्र समान
इन आश्रम-तरुओं का तत्त्वावधान
अपना स्नेह-श्रम प्रदानपूर्वक ।
हो सकेगा तेरा अनुभव सार्थक
स्वभावतः उसी भाव से,
संसार में पुत्र-रत्न दुर्लभ कैसे ।
दूर करने तेरे सभी अभाव इधर
अनुकम्पा रहेंगी तत्पर ॥’ (२४)

मुनिवर की अनुज्ञा से चलीं सब निरलस
पद्म-सुकुमार करों में लेकर कलस ।
कन्याओंके बीच भाती रही कान्ति सीता की,
जैसे स्फटिक-समूह में चमक हीरा की ।
प्रस्थान किया सबने
उपवन के प्रति,
शोभा बढ़ाई कानन ने
पाकर वही सम्पत्ति ॥ (२५)

सीता पधारीं वनलक्ष्मी के द्वार पर,
तब दिनकर-किरण से शोभायमान
वह उल्लसित-अन्तर
बिखरा मधुर मुस्कान
पल्लव-अधरों में
सुन्दर मधुक-दन्तपङ्क्तियों में,
सादर उसी क्षण
हरने लगी अन्तःकरण ।
अर्पण किया रंगशाल्मली-अर्घ्य मंगल
साथ पाद्य दूर्वादल-शिशिर-पटल ॥ (२६)

प्रदान किया स्थलपद्म का आसन,
कहा सारिका-स्वर-छल में
प्रीति-पूरित मधुर स्वागत वचन ।
खिलाकर नव पंकज जल में
शरत्-सरसी भ्रमर-स्वन में जैसे
कहती कलहंसी से,
वनलक्ष्मी बोली
वाणी मधुभरी :
‘तेरे चरण-अरुण से आली !
बीती मेरी वेदना-विभावरी ॥ (२७)

सौभाग्यवश तुझे मैंने पाया,
आकाश-प्रसून सत्य अपनाया ।
समाया मेरे मन में
आनन्द अपार ।
चित्रकूट-उपत्यका में,
सिद्धगण-सेवित दण्डकावन में,
पारावार के उस पार
लंकापुरी की अशोक-वाटिका में,
तुझे अपने सामने
आदर्श मानकर मैंने
चौदह वर्षों तक रची
प्रीति-प्रतिमा सच्ची ॥ (२८)

आ रही थी जब लौट चली
पुष्पकारूढ़ तू गगन-मार्ग पर,
खड़ी मैं तब ले पुष्पाञ्जली
हरिण-नयनों में शोकभर
ऊपर को निहार,
तुझे मयूरी की बोली में पुकार
रही थी बड़ी चाह से,
लम्बी राह से ।
अरी प्यारी !
सहेली की बात मन में करके याद
क्या तू आज पधारी
इतने दिनों बाद ? (२९)

आली ! लम्बी विरह-व्यथा
मैंने विशेष झेल न पाकर सर्वथा
अन्तिम चिन्ता से तापसी-वेश अपनाया,
तेरे हृदय-दर्पण में सस्नेह-रस प्रतिबिम्ब डुबाया ।
तुझे कर लिया वरण
हर्षित-अन्तःकरण ।
धन्यवाद अपार
कर ले स्वीकार,
जो तूने सश्रद्ध पूर्ण की
मेरी कामना हार्दिकी ॥ (३०)

साधु-संग प्राप्त होने से
सद्भाव सदा अटूट रहता,
नभोमण्डल में जैसे
नील रंग की अमिट सत्ता ।
साधु-बन्धु के पास कभी
मनोवाञ्छा होती नहीं निष्फल,
पा सकी मैं इसी कारण अभी
तेरे दर्शन सुमंगल ।
यह सफलता, सखि ! सौभाग्य से मिलती,
तेरे भाव ने मुझे बना दी भाग्यवती ॥’ (३१)

बुझाने सती-हृदय-वन-ग्रासी
प्रखर विरह-दावानल,
मानस में उस पल
मधुमोहिनी वही
कानन-लक्ष्मी भाती रही
नवोदित मेघमाला-सी ।
बोलीं जनक-कुमारी
स्नेहमय वचन :
‘तेरे कारा में, अरी प्यारी !
मैं बन्दिनी बन गई आजीवन ॥’ (३२)
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(पादटीका :
[1] कुम्भाट = पक्षीविशेष ।
[2] कलिंग = पक्षीविशेष ।
[3] मन्दाकिनी = चित्रकूट की एक गिरिनदी ।)
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(तपस्विनी काव्य का चतुर्थ सर्ग समाप्त)
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[ सौजन्य :
स्वभावकवि-गंगाधर-मेहेर-प्रणीत "तपस्विनी".
हिन्दी अनुवादक : डॉ. हरेकृष्ण मेहेर.
प्रकाशक : सम्बलपुर विश्वविद्यालय, ज्योति विहार, सम्बलपुर, ओड़िशा, भारत.
प्रथम संस्करण २००० ख्रीष्टाब्द.]
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Complete ‘Tapasvini’ (Hindi-English-Sanskrit Versions)
Link:
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