Thursday, May 14, 2015

Sanskrit Tapasvini of Harekrishna Meher : An Article by B. Biswal

Poet Gangadhar Meher’s Tapasvini Kavya :
Sanskrit Translation by Harekrishna Meher : An Observation   
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Hindi Article By : Dr. Banamali Biswal
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(Courtesy : ‘Drik’, Volume 28-29, 2012-2013, pages- 42-49, Drig Bharati, Yojana-3, Jhusi, Allahabad, Uttar Pradesh)
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कवि गङ्गाधर-मेहेर-प्रणीततपस्विनीमहाकाव्य का
हरेकृष्णमेहेर-कृत संस्कृतानुवाद : एक समीक्षण
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* डॉ. बनमाली बिश्वाल

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      ओड़िआ वाङ्मय में स्वभावकवि-गङ्गाधरमेहेर (१८६२-१९२४) ‘प्रकृतिकवि’ के रूप में सुपरिचित और स्वनामधन्य हैं, जैसे संस्कृत साहित्य में महाकवि कालिदास और अंग्रेजी साहित्य में वार्ड्‌स्‌वार्थ् । कवि गंगाधर के प्रमुख काव्य हैं ‘तपस्विनी’, ‘प्रणयबल्लरी’ कीचकबध’, ‘इन्दुमती’, ‘उत्कळलक्ष्मी’, ‘अयोध्यादृश्य’, ‘भारतीभाबना’, ‘पद्मिनी’ ‘अर्घ्यथाळी’ आदि ।  भारतीय पृष्ठभूमि पर उनकी रचनायें आधारित हैं । उनकी लेखनी में प्रतिभात हैं भारतीयता, देशभक्ति, राष्ट्र के प्रति आन्तरिकता, भारतीय नारी का सामाजिक सम्मान एवं आदर्शबोध, साहित्य-संगीत-कला का आन्तरिक आदर, विनम्रता और साधुता की गभीर संवेदना, प्रकृति की अपूर्व मधुरिमा, सामाजिक संस्कार  एवं धर्मन्याय-संगत सारे सद्गुण । उनकी रचनाओं में इतना आकर्षण है कि पाठक निश्चितरूप से रसाप्लुत हो जाता है । 

       कवि गङ्गाधर मेहेर की रचनाओं में ‘तपस्विनी’ सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है । १९१४ ख्रीष्टाब्द में प्रणीत इस महाकाव्य में कुल ग्यारह सर्ग हैं और मुख्य रस है करुण । वाल्मीकि-रामायणीय उत्तरकाण्ड की सीता-वनवास कथावस्तु पर यह काव्य आधारित है, परन्तु कवि की मौलिक उद्भावना एवं विशेषता प्रणिधानयोग्य है । कवि कालिदास-कृत ‘रघुवंश’ के चतुर्दश सर्ग एवं नाट्यकार भवभूति के ‘उत्तररामचरित’ नाटक का प्रासंगिक प्रभाव यहाँ अनुभूत होता है । स्वामी राजा श्रीरामचन्द्र की धर्मपत्नी सती साध्वी जानकी निर्वासिता होकर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहकर ‘तपस्विनी’ के रूप में जीवनयापन करती हैं । कवि की दृष्टि में यहाँ ‘तपस्विनी’ हैं सीता । यह तपस्विनी-शब्द का आधार है रघुवंश में प्रयुक्त ‘साहं तपः सूर्य-निविष्ट-दृष्टिः’ इत्यादि श्लोक-पंक्ति । कवि गंगाधर ने अपनी सर्जनशील प्रतिभा से इस अपूर्व काव्य का प्रणयन पूर्वक भारतीय साहित्य को विशेष समृद्ध किया है ।

      प्रकृतिकवि गंगाधर की रचनावली को, विशेष रूप से ‘तपस्विनी’ महाकाव्य को विश्व-साहित्य दरवार में परिचित कराने हेतु डॉ. हरेकृष्ण मेहेर का साहित्यिक अवदान निश्चित अभिनन्दनीय और सराहनीय है । डॉ. मेहेर संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, ओड़िआ और कोशली भाषाओं के एक सुसाहित्यिक कवि तथा सफल अनुवादक हैं । उन्होंने तपस्विनी काव्य का हिन्दी-अंग्रेजी-संस्कृत त्रिभाषी अनुवाद या अनुसृजन करके इसका गौरव बढ़ाने में बहुत सहायता की है और साथ ही अपनी अनुवाद-कला का सुपरिचय प्रदान किया है । उनका हिन्दी तपस्विनी अनुवाद सम्बलपुर विश्वविद्यालय द्वारा २००० ख्रीष्टाब्द में प्रकाशित हुआ है । अंग्रेजी अनुवाद आर्. एन्. भट्टाचार्य कोलकाता द्वारा २००९ में प्रकाशित होकर आन्तर्जातीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त है । संस्कृत तपस्विनी अनुवाद परिमल पब्लिकेशन्स् दिल्ली द्वारा २०१२ में प्रकाशित हुआ है (आन्तर्जातिक मानक पुस्तक संख्या : ९७८-८१-७११०-४१२-३) । ये तीनों अनुवाद अन्तर्जाल पर डॉ. मेहेर के जालपुट (http://tapasvini-kavya.blogspot.in/2013/05/complete-tapasvini-kavya-hindi-english.html) में उपलब्ध हैं ।  उनके द्वारा अनूदित संस्कृत तपस्विनी के बारे में यहाँ कुछ प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है । 

      डॉ. हरेकृष्ण मेहेर के कई अनुवादों में ‘तपस्विनी’ महाकाव्य का संस्कृत रूपान्तर एक उल्लेखनीय ग्रन्थ है । उनके विभिन्न अनुवादों में अनुवाद-शैली की विशेषता है मूलभाषा के भाव को यथासंभव अपनी मौलिक शब्दावली के प्रयोग से उपयुक्त परिवेषण करना और यथार्थ सुरक्षित रखना । मुक्त छन्द में व्यवधान एवं अव्यवधान से मित्राक्षर और उपधा मिलन का प्रयोग उनके अनुवाद का प्रणिधेय तत्त्व है । तपस्विनी-अनुवाद में भी उनकी शैली उसी प्रकार परिलक्षित होती है । उन्होंने अनुवादकीय अनुभूति का बयान करके त्रिभाषी रूपान्तर के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं । अपनी अनुवाद-शैली के बारे में उन्होंने ‘प्राक्‌कथनम्’ में लिखा है :

     ‘तपस्विनी- महाकाव्यस्य मदीयानुवादानां सारस्वते त्रिवेणी-स्रोतसि मया रुच्यनुरूपं मुक्तच्छन्दोधारया सह  व्यवहितैरव्यवहितैश्च मित्राक्षरैरुपधा-मिलनस्य विहितोऽस्ति प्रयोगः । अनुवादत्रये मम रचनाशैली प्रायेण समरूपा । मित्राक्षरच्छन्दःसमेतम् अमित्राक्षरच्छन्दोऽपि मम प्रियम्; तथापि मित्राक्षरच्छन्दस्तथा अन्त्यानुप्रासं प्रति मम विशेषाकर्षणं वर्त्तते । अतः सर्वेषु त्रिषु अनुवादेषु मित्राक्षर-प्रयोगो मामकं सारस्वतानुराग-विशेषत्वं द्योतयति इति समनुभूयते । एषु भाषान्तरेषु अधिकतया मदीय-मौलिक-शब्दावली-माध्यमेन काव्यस्य मूलभावाः पूर्णतया यथार्था अक्षुण्णाः सुरक्षिताश्च विद्यन्ते इति मे दृढ़ो विश्वासः ।’   

     कवि गंगाधर मेहेर ने अपने काव्यों में भारतीय साहित्य-परम्परा को यथासम्भव सश्रद्ध सम्मान प्रदान किया है ॥ प्रान्तीय भाषा-साहित्यों में संस्कृत साहित्य का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है । यहाँ उल्लेखयोग्य है एक और विशेष विषय, जिसमें तपस्विनी के महाकाव्यत्व-प्रतिपादन के साथ सामग्रिक अनुशीलन का सारांश सन्निवेशित है । संस्कृत के प्रख्यात अलंकारशास्त्री विश्वनाथ कविराज ने अपने ‘साहित्यदर्पण’ ग्रन्थ में महाकाव्य का लक्षण निरूपित किया है, ‘सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रैको नायकः सुर: । सद्वंशः क्षत्रियो वापि धीरोदात्त-गुणान्वितः ॥’ इत्यादि कारिकाओं में । अनुवादक डॉ. हरेकृष्ण मेहेर ने साहित्यदर्पण-निर्देशित आलंकारिक शैली में ‘तपस्विनी’ के महाकाव्यत्व एवं सारतत्त्व को अपनी ललित मधुर पदावली में निबद्ध किया है इस प्रकार :

‘तपस्विनी-महाकाव्यं  स्वभावकविना कृतम् । 
गङ्गाधर-मेहेरेण   रङ्गायितं सुवर्णकम् ॥
जानकी नायिका यत्र  श्रीराम-सहधर्मिणी ।
सती-शिरोमणी साध्वी  पतिव्रता तपस्विनी ॥
सर्गा एकादश ख्याताश्छन्दोरागैरलङ्कृताः ।
ग्रन्थाद्यं प्रार्थना-वस्तुनिर्देशात्मक-मङ्गलम् ॥
निर्वासनोत्तरं वृत्तं   रामपत्न्याः प्रकीर्त्तितम् । 
सीतायाश्च तपश्चर्या-विभा कवेरभीप्सिता ॥
वाणी भावमयी स्निग्धा   प्रधानः करुणो रसः ।
दर्शनीयं निसर्गस्य  चित्रणं चात्र मञ्जुलम् ॥
मौलिकोद्भावना भाति  कवेरत्र स्वतन्त्रता ।
सौरभं भारतीयं च  सांस्कृतिकं सुसम्भृतम् ॥
सीताचरितमाश्रित्य  विशेषेण विनिर्मितम् ।
वक्तुं हि शक्यते काव्यं  सीतायनमिति स्मृतम् ॥
ओड़िआ-मूलभाषायाः  कृतः संस्कृत-भाषया ।
मम काव्यानुवादोऽयं  मोदयतु सतां मनः ॥’

     इसके साथ ‘तपस्विनी’ ग्रन्थ में सन्निवेशित है डॉ. मेहेर का एक दीर्घ शोधलेख, शीर्षक है ‘तपस्विनी-महाकाव्यम्: एकमालोकनम्’ । इसमें तपस्विनी का एक सामग्रिक एवं तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है । अब देववाणी में अनूदित तपस्विनी की कुछ पंक्तियों का परिवेषण किया जा रहा है सहृदय पाठकवर्ग के काव्यरसास्वादन एवं मनोरञ्जन के लिये ।   

    रूपकालंकार माध्यम से कवि गंगाधर मेहेर ने ‘तपस्विनी’ काव्य के मुख्य विषय की सूचना दी है ।  दशम सर्ग में कवि ने रामायण की करुणगाथा को अपनी शब्दों में व्यक्त किया है इस प्रकार । ओड़िआ मूल पद्य है:

रस-रत्नमय   काव्य-शिखरी,
बिराजन्ति य़हिँ  राम-कॆशरी ।
राबण-बारण- रकत-धार,
बहइ  झर्झर  निर्झराकार ।
कान्दन्ति,  सिंही कन्दरे रहि,
दन्ति-दन्ताघात-बेदना सहि  ॥

अनुवादक डॉ. मेहेर के अपने संस्कृत पदविन्यास में यह पंक्ति है:

रस-रत्न-परिपूर्णः काव्य-पर्वतो वर्त्तते
श्रीरामचन्द्र-मृगेन्द्रो यत्र विराजते ।
दशकन्धर-सिन्धुरस्य रुधिर-धारा
प्रवहति झर्झरं निर्झरिणी ।
क्रन्दति तद्-गिरि-कन्दरागारा
विषह्य दन्ताबल-दन्ताघात-क्लेशं केशरिणी ॥  (दशम सर्ग)

   द्वितीय सर्ग में ऋषिवर वाल्मीकि पतिव्रता सीता को जब सान्त्वना प्रदान करते हैं, उसी प्रसंग में सागर-सङ्गम के लिये उत्सुक सरिता की स्वाभाविक आन्तरिक प्रीति का दृष्टान्त उपस्थापित किया गया है । ओड़िआ मूल पद्य है :  
    
      स्रोतस्वती-गति सहज    थाए सागर आशे,
      लङ्घे शिळा-शैळ-सङ्कट  य़ेबे बिरुद्धे आसे ।
      सागर-सङ्गमे बिस्मरे    सबु बिगत क्लेश,
      उभय जीबने न रहे     आउ  प्रभेद  लेश ।

      बिधिबशे उठि मध्यरे    य़ेबे ऊर्द्धकु भेदि,
      बालि-स्तूप दिए सरित- सिन्धु-हृदय छेदि ।
      सरित मरि त न पारे     तार  जीबन-भार,
      हृदय प्रसारि रखइ      होइ  ह्रद आकार ॥ 

डॉ. मेहेर के संस्कृत अनुवाद में यह पंक्ति इस प्रकार जीवन्त होती है :

      स्वत एव गति-र्भवति
     स्रोतस्वत्याः पारावारं  प्रति ।
     लङ्घति सा शिला-शैल-सङ्कट-सकलम्
     समागच्छति मार्गे यद् विरुद्धमर्गलम् ।
     पूर्व-क्लेश-समस्तं विस्मर्यते
     तया तोयनिधे-र्मिलने,
     भेद-लेशोऽपि पुन-र्नावशिष्यते
     तयोरुभयो-र्जीवने ॥

     मध्ये दैववशात् समुत्थाय सपदि
     ऊद्‌र्ध्वं भित्त्वा यदि
     छिनत्ति बालुका-स्तूपस्तयोः
     हृदयं ह्रादिनी-समुद्रयोः,
     कल्लोलिनी तु न म्रियते ।
     प्रियतमस्य कृते
     वहति सा जीवन-भारं स्वयम्
     ह्रदाकारं प्रसार्य स्वहृदयम्  ॥ (द्वितीय सर्ग)

      तपस्विनी के चतुर्थ सर्ग का उषा-वर्णन ओड़िशा में विशेष लोकप्रिय है । ‘मङ्गळे अइला उषा’ वाक्य से कवि गंगाधर मेहेर समग्र राज्यभर सुपरिचित हैं ।  चतुर्थ सर्ग के आरंभ में वाल्मीकि मुनि के आश्रम पर पदार्पण करती है सुन्दरी उषा, जो प्रकृतिकवि गंगाधर की लेखनी में अपूर्व सौम्य कान्त रूप से सुसज्जित है । प्रस्तुत है प्रथम पंक्ति, जो ओड़िआ भाषा के अत्यन्त मनमोहक श्रुतिमधुर सांगीतिक ‘चोखि’ राग में रचित है । श्रीरामरानी सती सीतादेवी के स्वागत सत्कार करने प्रकृति की अतीव सुन्दर अंशरूपिणी उषा यहाँ उपस्थित है । ओड़िआ साहित्य में स्वभावकवि का सुप्रसिद्ध यही पद्य वास्तव में सदैव स्मरणीय है । ओड़िआ मूल पद्य इस प्रकार है :

मङ्गळे अइला उषा       बिकच-राजीब-दृशा
       जानकी-दर्शन-तृषा  हृदये बहि,
कर-पल्लबे नीहार-         मुक्ता धरि उपहार
    सतीङ्क बास-बाहार  प्राङ्गणे रहि ।
            कळकण्ठ-कण्ठे कहिला,
     दरशन दिअ सति ! राति पाहिला ॥

     डॉ. मेहेर के संस्कृत रूपान्तर में भी यह पंक्ति उसी प्रकार आस्वादनीय है । अनुवादक ने वैदिक मन्त्रों में वर्णित उषा के लिये प्रयुक्त ‘सूनरी’ पद का यहाँ प्रसंगवश प्रयोग करके और अधिक सुन्दरता का यथार्थ समावेश किया है । उनके अनूदित संस्कृत शब्दों में भाव इस प्रकार व्यक्त हुए हैं :    

    मङ्गलं समागता सौम्याङ्गना
    उषा व्याकोषारविन्द-लोचना
    वैदेही-दर्शनाभिलाषं वहन्ती स्वहृदये ।
    पल्लव-कर-द्वये
    नीहार-मौक्तिक-प्रकरोपहारं दधाना
    सती-निलय-बहिरङ्गणे विद्यमाना
    अभाषत कोकिल-कण्ठस्वना सूनरी,
    ‘दर्शनं देहि सति ! प्रभाता विभावरी’ ॥  (चतुर्थ सर्ग)

    कन्या के प्रति माता की संवेदना हृदय की गहरी दिशा को पहचानती है और उसी प्रकार माता के प्रति कन्या की आन्तरिक ममता अटूट रहती है । काव्य में प्रसंगानुसार मातृस्वरूपा तमसा नदी के प्रति कन्या-स्वरूपा सीता की कारुण्यभरी आन्तरानुभूति वास्तविक आत्मीयता का प्रकृष्ट निदर्शन है । ओड़िआ मूल पद्य इसप्रकार है :

सीता बोइले, ‘पनीर-       मधुर ए स्चच्छ नीर
      नीर नुहे जननीर   क्षीर प्रत्यक्षे,
 गिरि-स्तनुँ विनिःसृत      होइ आसुछि अमृत-
      धारा परि सीता मृत-कळपा लक्ष्ये ।
           ओहो तु त मो मा ए देशे,
    मो दुःखे विदीर्ण-वक्षा तमसा-वेशे ॥’

डॉ. मेहेर के संस्कृत रूपान्तर में यह हृदयस्पर्शी पंक्ति इस प्रकार है:

     जानक्या व्यक्तमकारि,
     ‘अनाविलमिदं वारि
     नारिकेल-नीर-सम्मितम्
     माधुर्य-प्रपूरितम् ।
     न खलु तन्नीरम्,
     भाति जनन्याः प्रत्यक्षमेव क्षीरम् ।
     पर्वत-वक्षोज-विनिःसृतमेतत्
     प्रवहति पीयूष-निष्यन्दवत्
     कृते मृतकल्पायाः
     कन्यकायाः सीतायाः ।
     देशेऽस्मिन्नहो ! त्वमेव माता मे सदाशया
     तमसामूर्त्ति-र्मद्वेदना-विदीर्णहृदया ॥’ (चतुर्थ सर्ग)

     तपस्विनी काव्य में करुणरस की प्रतिमा सीता का प्रासंगिक शोभावर्णन भी अत्यन्त रोचक है । मुनिवर वाल्मीकि के समक्ष तापसी कन्या सुनाती है वन के भीतर उपेक्षित सीता की उपस्थिति के बारे में । ओड़िआ मूल पद्य है इस प्रकार :
        सम्बोधन करि थरकु  थर ता प्रिय कान्ते,
       पति-गुण पति-बात्सल्य  स्मरुअछि एकान्ते ।
       लळित दिशुछि ललाटे  तार सिन्दूर-बिन्दु,
       मुख-कमळकु होइछि  य़ेह्ने पूर्णिमा-इन्दु ॥

डॉ. मेहेर के संस्कृत अनुवाद में यही पद्य इस प्रकार व्यक्त है :

    सम्बोधयन्ती वारंवारम्
    प्रियतमं भर्त्तारम्
    स्मरति विविक्ते स्वमनसा
    वात्सल्यं गुणराशिं स्वामिनः सा ॥
    तस्या ललाट-देशे सन्दृश्यते
    सिन्दूर-बिन्दुः सुन्दरः ।
    वदनारविन्दं प्रति प्रतीयते  
    यथा राका-कलाकरः ॥ (तृतीय सर्ग)

   प्रकृति एवं सीता परस्पर दुःख-सुख की समभागिनी हैं । हर सर्ग में प्रकृति का चित्रण कवि की लेखनी में विशेष मनोहारी और आकर्षक प्रतीत होता है । प्रकृति के सारे विभाव प्राणवान् सजीव और मानवायित हैं । चतुर्थ सर्ग का फिर एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत है, जहाँ सीता के प्रति वनलक्ष्मी की हार्दिक सखी-प्रीति अभिव्यक्त है । आश्रम के उद्यान में कवि-कल्पिता वनलक्ष्मी सखी-रूपिणी सीता के प्रति भावभरी बातें कहती है । ओड़िआ मूल पद्य है :

य़ेतेबेळे पुष्पकरे            बाहुड़िगलु  पुष्करे
     उभा होइ पुष्प-करे  मृग-नयने,
ऊद्‌र्ध्वे चाहिँ बिषादरे    तोते मयूरी-नादरे
     डाकु य़े थिलि सादरे  दीर्घ अयने ।
        सखी-कथा स्मरि मनरे,
आसिलु कि सखि ! आजि एते दिनरे ॥

डॉ. मेहेर के संस्कृत-भाषान्तर में यह भावभरी वाणी इस प्रकार है :

     समारूढ़-पुष्पक-विमाना
     प्रत्यावृत्ता यदा गगनायने त्वम्,
     पुष्प-करा तदाऽहं दण्डायमाना,
     मृग-नयनाभ्यामूर्ध्वम्
     सविषादं विलोकयन्ती,
     आसं मयूरी-स्वनैस्त्वामाहूतवती
     सुदीर्घ-मार्गतः सादरम् ।
     वचनं सख्याः संस्मृत्य मानसे
     सखि ! कृत-पदार्पणा किमद्य विद्यसे
     एतावद्-दिवसानन्तरम् ?  (चतुर्थ सर्ग)

     कवि गङ्गाधर के वर्णन में पत्नीविरह से व्याकुल श्रीराम राजसिंहासन को अत्यन्त तुच्छ समझते है ।  प्रजारञ्जन-रूप राजधर्म के पालन हेतु उन्होंने अपना समस्त पारिवारिक सुख को भी त्याग दिया है । फिर भी उनके हृदय में सदा विराजित हैं प्राणप्रिया पद्मिनी सीता । श्रीराम का मन-भ्रमर सरस कमल के मकरन्द के आस्वादन में मग्न है । तृतीय सर्ग में प्रसङ्गानुसार प्रियाविरह-व्याकुल सीतापति श्रीराम अपने इन्द्रियों को प्रबोधना देते हैं । उदाहरण-स्वरूप, ओड़िआ मूल पद्य को देखा जा सकता है :

आउ एक कथा          कहुछि एकता
      बान्धि तुम्भे मन सङ्गे,
चाल हृद-सरे            अनन्त बासरे
      बिळसिब  रस-रङ्गे ।
मो प्राण-सङ्गिनी      नब कमळिनी
       फुटि रहिअछि तहिँ,
स्मरण-भास्कर         चिर तेजस्कर
      अस्त तार नाहिँ य़हिँ ॥

डॉ. मेहेर के संस्कृत अनुवाद में इस प्रकार शब्द--संयोजना है :

     ब्रवीमि विषयमेकमपरम्
     यूयं स्वान्तेन सार्धम्
     ऐक्य-बद्धाः सर्वे निर्बाधं
     व्रजत हृदय-सरोवरम् ।
     अशेष-दिवसान्यथ
     रस-रङ्गेषु विलसिष्यथ ॥
     तत्र वर्त्तते मम जीवन-सङ्गिनी
     प्रफुल्ला नवीना राजीविनी,
     यस्मिन् सुचिर-ज्योतिष्मान्
     स्मरण-विवस्वान्
     अविरतं विराजते,
     कदापि नास्तं भजते ॥  (तृतीय सर्ग)

    कवि गंगाधर मेहेर के ‘तपस्विनी’ काव्य में वर्णित श्रीरामचन्द्र एक महान् आदर्शवादी प्रजावत्सल राजा और सामाजिक त्यागी गृहस्थ हैं । आदर्श पति हैं श्रीराम एवं आदर्श पत्नी हैं साध्वी पतिव्रता सती सीता । ये दोनों भारतीय संस्कृति में युग-युग पूजास्पद और सदैव स्मरणीय हैं । कवि ने इस काव्य के हर सर्ग में सीता के लिये ‘सती’ शब्द का प्रयोग करके उनके उज्ज्वल आदर्श चरित्र का अनुपम चित्रण किया है ।   

     ‘तपस्विनी’ के उपर्युक्त उदाहरण केवल दिग्दर्शनमात्र हैं । समग्र पुस्तक में अपने सरस, लालित्य-माधुर्यपूर्ण एवं आनुप्रासिक शब्दविन्यास के माध्यम से अनुवादक डॉं. हरेकृष्ण मेहेर ने स्वकीय अनुवाद-कला का एक सफल निदर्शन उपस्थापित किया है । उनका सुरभारती-रूपान्तर में प्रस्तुत यह ‘तपस्विनी’ महाकाव्य निश्चित ही आधुनिक संस्कृत साहित्य की समृद्धि में विशेष सहायक होगा और सहृदय काव्यामोदी विद्वानों का आदर-भाजन रहेगा, ऐसा विश्वास है ।

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[ सौजन्य : ‘दृक्’ (समकालिक - संस्कृत-साहित्य-समीक्षा-पत्रिका),
ISSN : 0976- 447X. 
संयुक्त अंक : २८-२९ (जुलाई २०१२ - जून २०१३), पृष्ठ : ४२-४९,
प्रकाशिका : दृग् भारती, योजना-३, इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश ।]
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Tuesday, January 6, 2015

Cover Images of 'Tapasvini' Books (Hindi-English-Sanskrit Versions): Dr. Harekrishna Meher

Cover Images of 'Tapasvini' Books 
(Hindi-English-Sanskrit Versions): 
Dr. Harekrishna Meher 
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 1. TAPASVINI 
      (Complete Hindi Version of Oriya Kavya
       of Swabhava-Kavi   Gangadhar Meher),
       Translated by : Dr. Harekrishna Meher.
       Publisher: Sambalpur University, Jyoti Vihar, Orissa, 2000. 




2.  TAPASVINI OF GANGADHARA MEHER 
      (Complete English Version of Oriya Kavya Tapasvini),
      Translated by : Dr. Harekrishna Meher.
      ISBN : 81-87661-63-1, 
      Publisher: R.N. Bhattacharya, A-127, HB.Town,
      Sodepur, Kolkata, 2009. 




3.  TAPASVINI  (MAHAKAVYAM)
      (Complete Sanskrit Version of Poet Gangadhara Meher’s
      Oriya Kavya Tapasvini)
      Translated by : Dr. Harekrishna Meher.
      ISBN: 978-81-7110-412-3.
      Publisher: Parimal Publications, 27/28, Shakti Nagar, 
      Delhi-7, 2012.
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Complete Books Link :

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Tuesday, October 7, 2014

Modern Sanskrit Literature: Contributions of Dr. Harekrishna Meher (Article)

Adhunika- Samskrita-Sahityam Prati 

Kavi-Harekrishna-Meherasya  Avadanam 

(Sanskrit Research Article by : Dr. Jayanta Kumar Tripathy) 

Published in Sanskrit Research Journal 'Sraddha' (ISSN 2321-273X)  

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आधुनिक-संस्कृत-साहित्यं प्रति 
कवि-हरेकृष्ण-मेहेरस्य
 अवदानम्
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        डॉजयन्त-कुमार-त्रिपाठी    


उपक्रमः

    संस्कृतं नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः  इति काव्यादर्शकारस्य दण्डिनः  वर्णनायां संस्कृत-भाषा देवभाषा इति विशेषत्वमर्हति । संस्कृतं नाम भाषा-जननी वैदिक-कालादारभ्य साम्प्रतिकयुग-पर्यन्तं निरन्तरं गतिशीला प्रगतिशीला च अग्रेसरति । सा गीर्वाण-वाणी यादृशी प्राचीनतमातादृशी आधुनिकतमाऽपि । समयानुसारं बहुबाधा-विघ्न-समूहैः पीड़िता अवहेलिता सती सुरभारती साम्प्रतिक-काले अधिक-दीप्यमाना विराजते । अस्माभिः विद्यालयेषु महाविद्यालयेषु विश्व-विद्यालयेषु च संस्कृत-विषये यानि यानि पठितानिआधुनिक-काले तैः सार्धं नूतनानि बहूनि काव्यादीनि दृष्टि-पथमवतरन्ति । काव्यादि-रचनासु पुरातन-शैल्या साकं नव्या आधुनिक-शैली अपि सारस्वत-साधनायां स्वीकृतास्ति । साहित्यस्यापि  जायते युगानुसारं परिवर्त्तनं  किञ्चित् । संस्कृतं  केवलं रक्षणशीलं साहित्यं  न भवति । साम्प्रतिके    संस्कृत-साहित्ये   काव्य-कृतीनांनैके विभावाः दरीदृश्यन्ते । पुरातन-साहित्यवत् सम्प्रति विरच्यन्ते महाकाव्यानिखण्ड-काव्यानिगीति-काव्यानिस्तोत्र-काव्यानिगद्य-काव्यानिनाटकानिकथाश्चेत्यादीनि । एतैः सार्धं नव्य-शैल्या प्रणीयन्ते नूतनच्छन्दोभिः नव्य-काव्यानि, नूतन-मौलिक-च्छन्दोभिः नाना-गीति-काव्यानि, नूतनशैल्या नाटक-वीथी-नाटकानि, हास्य-व्यङ्ग्य-काव्यानि, उपन्यासिका- उपन्यास-रचनानि, नव्यरूपेण कथा-क्षुद्रकथाश्च । संस्कृतभिन्न-च्छन्दोभिः कृतानि विविधानि गल-गीत-काव्यानि, हाइकु-सिजो-तान्का-प्रभृति-विदेशीय-च्छन्दोभिः संस्कृत-कविता-काव्यादीनि च लोचन-गोचराणि भवन्ति । अनेन परिलक्ष्यते यत् आधुनिक-रुच्यनुसारं प्रवर्त्तते जनानां चित्तहारकं साम्प्रतिकं संस्कृत-साहित्यम् ।  

    आधुनिक-संस्कृत-साहित्ये अनेके कवयः राजन्ते यथा, अभिराज-राजेन्द्र-मिश्रःभास्कराचार्य-त्रिपाठीश्रीनिवास-रथः,हरिदत्त-शर्मागोविन्दचन्द्र-पाण्डेयःराधावल्लभ-त्रिपाठीरमाकान्त-शुक्लःपुष्पा-दीक्षितःहर्षदेव-माधवःबनमाली-बिश्वालः चेत्यादयः । आधुनिक-संस्कृत-कविषु हरेकृष्ण-मेहेरः काव्यकविता-गीति-प्रभृति-रचनाप्रतिभया निज-स्वतन्त्र-शैल्या विशिष्टमेकं स्थानमधिकरोति । 

कवि-परिचयः 

     हरेकृष्ण-मेहेरः ओड़िशायाः नूआपड़ा-जिल्लान्तर्गते सिनापालि-ग्रामे ख्रीष्टाब्दे ०५-०५-१९५६ इति दिनाङ्के कवि-परम्परा-वाहिनि परिवारे लब्धजन्मा । तस्य पितामहः कवि-मनोहर-मेहेरः पश्चिम-ओड़िशायाः गणकवि-रूपेण लोके चर्चितः । पितुः कवि-नारायणभरसा-मेहेरस्य मातुः सुमतिदेव्याश्च अङ्कं मण्डयन् सुपुत्रः सञ्जातः हरेकृष्णः । एक-साहित्यिक-परिवारस्य उत्तम-दायादो हरेकृष्ण-मेहेरः ।

   कवि-परम्परायां हरेकृष्ण-मेहेरः सर्जनात्मक-प्रतिभावान् विशेषाभिरुचि-सम्पन्नः भाषा-साहित्य-सङ्गीतकलासु । स संस्कृताध्यापकःकविःगवेषकःसमालोचकःप्राबन्धिकःगीतिकारःस्वर-संयोजकःसफलानुवादकः सुवक्ता च । अनेक-भाषाविदा हरेकृष्ण-मेहेरेण कृताः संस्कृत-हिन्दी-आङ्गल-ओड़िआ-कोसली-भाषासु नैकाः मौलिक-रचनाः अनुवादाश्च सहृदय-समाजे प्रथिताः विद्यन्ते । जातीयान्तर्जातिक-स्तरेषु विभिन्न-मुखपत्र-पत्रिकासु तस्य लेखाः प्रकाशिताः सन्ति । तेन विश्वसंस्कृत-सम्मेलनादिना सार्धम् अनेकेषु जातीयालोचना-चक्रेषु कवि-सम्मेलनेषु च सक्रियं योगदानं कृतम् । संस्कृतस्य आधुनिकी-करण-दिशायां सरलीकरण-दिशायां च स सदैव प्रयत्नशीलः । स्वोद्भावितैः मौलिक-च्छन्दोभिः आधुनिक-नवगीति-रचना स्वरलिपि-स्थापनं परिवेषणं च तस्य कवि-प्रतिभायाः विशेषत्वम् । उत्कल-विश्वविद्यालयसागर-विश्वविद्यालयादिषु प्रस्तुत-शोधग्रन्थेषु तस्य कृति-विषये शोधात्मक-लेखाः अन्तर्भुक्ताः सन्ति । आकाशवाणी-दूरदर्शनादिषु तस्य लेखाः कविताः गीतयश्च प्रसारिताः । आन्तर्जातिक-जीवनी-ग्रन्थेषु तस्य परिचयात्मकं विवरणं प्रकाशितं प्राप्यते । ओड़िशा-साहित्य-अकादम्याः स  पूर्वतन-सदस्यः । साहित्यिक-सांस्कृतिकानुष्ठानैः  अनेकैः सार्धं सक्रिय-रूपेण सम्पृक्तो विद्यते ।

    अनेक-संस्थानां प्रदत्तैः साहित्यिक-सम्मानैः हरेकृष्ण-मेहेरः सभाजितोऽस्ति । तस्मै प्रदत्त-सम्मानेषु गङ्गाधर-सम्मानः(पाटनागड़२००२), गङ्गाधर-सारस्वत-सम्मानः (बरपालि२००२), जयकृष्ण-मिश्र-काव्य-सम्मानः (कटक२००३), विद्यारत्न-प्रतिभा-सम्मानः (भुवनेश्वर, २००५), अवार्ड् अफ् एप्रिसिएशन् (जयदेव-उत्सवःनवदिल्ली२००८), अशोक-चन्दन-स्मारक-गङ्गाधर-सम्मानः (बरपालि, २००९), आचार्य-प्रफुल्लचन्द्र-राय-स्मारक-सम्मानः (एकाडेमी अफ् बेङ्गली पोएट्री, कलकाता,२०१०), हरिप्रियामुण्ड-स्मारक-गङ्गाधरमेहेर-सम्मानः (बरपालि२०१०), नीलमाधव-पाणिग्राही-सम्मानः (सम्बलपुर-विश्वविद्यालयः,२०१०), विश्व-संस्कृतदिवस-सम्मानः (भवानीपाटना२०१३), वाचस्पति गणेश्वर-रथवेदान्तालङ्कारसम्मानः(भवानीपाटना,  २०१३) चेत्यादयः प्रमुखाः सन्ति । एतद्-व्यतिरिक्तं बहु-साहित्यिक-संस्थाभिः प्रदत्तैः मानपत्रादिभिः स संवर्धना-प्राप्तः ।

   कवि-हरेकृष्ण-मेहेरस्य शिक्षागत-योग्यतापि प्रशंसनीया । उत्कल-विश्वविद्यालयात् संस्कृत-स्नातक-सम्माने प्रथम-श्रेण्यां प्रथमः (१९७५); वाराणसी-नगर्याः काशी-हिन्दु-विश्वविद्यालयात् सम्प्राप्तम् उपाधि-त्रयम् : एम्.. (संस्कृतम्प्रथम-श्रेण्यां प्रथमःस्वर्णपदक-प्राप्तः (१९७७); पीएच्डीसंस्कृतम् (१९८१); डिप्लोमा-इन्-जर्मान् (१९७९। पीएच्.डी.-उपाधि-निमित्तं काशी-हिन्दु-विश्वविद्यालये तेन प्रस्तुतः Philosophical Reflections in the Naisadhacarita’ इतिशीर्षकः शोध-ग्रन्थ१९८९वर्षे कोलकतायाः  पुन्थि-पुस्तक-संस्था-द्वारा प्रकाशितः सन् आन्तर्जातिक-स्तरे समादृतः लभ्यते ।

    १९८१-वर्षतः ओड़िशा-शिक्षा-सेवायां शासकीय-महाविद्यालयेषु कृताध्यापनः स शिष्यजन-समादृतः । ओड़िशा-प्रदेशस्य स्वनामधन्ये सम्बलपुर-स्थिते गङ्गाधर-मेहेर-स्वयंशासित-महाविद्यालये स सम्प्रति  स्नातकोत्तर-संस्कृत-विभागस्य मुख्यरूपेण कार्यरतः । कृतविद्येन तेन प्रणीतेषु आधुनिक-संस्कृत-काव्यादिषु विद्यन्ते  ‘मातृगीतिकाञ्जलिः’, ‘पुष्पाञ्जलि-विचित्रा’, ‘सौन्दर्य-सन्दर्शनम्’, ‘जीवनालेख्यम्’, ‘मौन-व्यञ्जना’, हासितास्या वयस्या’, ‘उत्कलीय-सत्कला’, ‘स्तवार्चन-स्तवकम्’, सूक्ति-कस्तूरिकामेहेरीय-च्छन्दोमाला’ चेत्यादयो मौलिक-काव्य-कृतयः । कविवर-राधानाथ-राय-कृतायाः वर्षा’ इति ओड़िआ-कवितायाः संस्कृत-श्लोकानुवादःस्वभावकवि-गङ्गाधर-मेहेर-विरचितस्य  ‘तपस्विनी’ इति प्रख्यातस्य ओड़िआ-महाकाव्यस्य (हिन्दी-आङ्गल-संस्कृत-भाषासु) तत्कृताः अनुवादाश्च  प्राधान्यं भजन्ते । कवि-गङ्गाधरमेहेर-कृतयोः प्रणयवल्लरी’ ‘अर्घ्यथाली’ चेति   ओड़िआ-  काव्ययोः  संस्कृतानुवादोऽपि  तेन  कृतो विद्यते । आङ्गल- हिन्दी-ओड़िआ-कोशली-प्रमुखासु  संस्कृतभिन्न-भाषास्वपि  कविना हरेकृष्ण-मेहेरेण अनेकानि मौलिकानि अनुवाद-रूपाणि च पुस्तकानि रचितानि  ।

रचना-शैली  

    हरेकृष्ण-मेहेरः न केवलं छन्दोबद्ध-रचनायाम्अपितु मुक्तच्छन्दोभिः कविता-प्रणयनेऽपि प्रवीणः । आधुनिकता-पुरातनतयोः समन्वयवादि-कवि-रूपेण स परिचितः । कविः  स्वयं गीतिकारः स्वर-संयोजकश्च विभाति । विविध-कवि-सम्मेलनेषु तस्य गीति-कवितादीनां  सुस्वर-परिवेषणं सहृदयैः बुधैः समाद्रियते । भारतीय-संस्कृतेः गौरवं तस्य रचनासु प्रतिफलितं विलोक्यते । आधुनिकी नव्यशैली-सम्पन्ना च तदीया दृष्टि-भङ्गी परिलक्ष्यते । राजते तस्य  काव्येषु पदावली माधुर्य-लालित्यमयी अनुप्रास-भरिताप्रसाद-गुणयुक्ता वैदर्भी-रीति-सम्पन्ना च । अत्र किमपि काठिन्यं जटिलत्वं दुर्बोधत्वं वा न लक्ष्यते । 

    भाषायाः सारल्यं सौकुमार्यं भाव-वैशद्यम्, शब्द-योजनायाः वैचित्र्यपूर्णं नैपुण्यम्, आलङ्कारिकतायाः मनोरमं सूक्ष्म-कौशलं रसोत्तीर्णत्वं चेत्यादीनि तत्वानि कवेः कृतीनां हृदयस्पर्शित्वं प्रकटयन्ति । काव्येषु भावानुकूला ललित-पदन्यास-समेता चमत्कारिता पाठकानां मानसं हरति । साङ्गीतिक-माधुरी अपि सहृदयानां चित्तमनायासेन समाकर्षितं विमुग्धं समाह्लादितं च कर्त्तुं समर्था । देशभक्तिःआध्यात्मिकतादार्शनिकतामानवतावाद-चिन्तन-धारा भाव-गाम्भीर्य-सहकारेण कलात्मक-रूपेण समन्विता दृश्यते । कान्ता-सम्मित-वचनस्य मनोज्ञमालेख्यं कवेः काव्येषु मूर्त्त-रूपेण समङ्कितम् ।  तस्य अनुवाद-कृतिषु अपि अर्थानुगतायां स्वीय-मधुर-ललित-पद-राजि-संयोजनायां प्रतिभायाः मौलिकता प्रतिभाति 

मातृगीतिकाञ्जलिः’ 

 हरेकृष्ण-मेहेरेण रचितं मातृगीतिकाञ्जलिः इति मौलिकं गीतिकाव्यं साम्प्रतिक-सहृदय-पाठक-समाजे लोकप्रियं विदुषामादरणीयं च वर्त्तते ।  कविना नव्य-मौलिकच्छन्दोभिः प्रणीताः पञ्चविंशति-संख्याकाः गीतिकाः काव्येऽस्मिन् सङ्कलिताः । काव्यमेतत् तस्य सर्जनशील-प्रतिभायाः प्रकृष्टं निदर्शनम् । जीवने समनुभूयमानाः विविधाः विषयाःगीतिकानामाधारभूताः विद्यन्ते । स्वप्रणीतः आङ्ग्लानुवादोऽपि अस्मिन् काव्ये सन्निवेशितः । राष्ट्रीय-स्तरे आन्तर्जातिक-स्तरे च अस्य गीति-काव्यस्य प्रसारार्थमनुवादोऽयं सहायको भवति ।

 मातृगीतिकाञ्जलि-काव्ये कविना मेहेरेण स्वयमेव प्रदत्तास्ति ताल-लय-समेत-गेयानां गीतिकानां साङ्गीतिक-महत्त्व-सहिता स्वरादि-सूचना । सा एवंप्रकारा
   
    “नव्य-शैल्या प्रणीतानां गीतिकानां कृता मया 
     स्वर-संयोजनाप्यासां स्वसामर्थ्य-समाश्रया 
    गायनं कर्त्तुमर्हन्ति गीतिकानां स्वरप्रदाः 
     स्व-सौविध्यानुसारेण सङ्गीतज्ञा विशारदाः 
             (प्रास्ताविकम्-,  पृ.१५)

   कविना परम्परामबलम्ब्य मौलिकी नूतन-च्छन्दोराजी रचितास्ति । स्वरचना-शैली-विषये कविः व्यनक्ति प्रास्ताविके
 अनुसृत्य परम्पराम्
 मात्राच्छन्दोभि-र्मौलिकैः स्वोद्भावितैः कृता मया  
 गीतिकावली सुतराम्
 प्रसाद-गुण-सम्पन्ना श्रद्धाबद्धा सदाशया 

  ललिता मधुरा रसभाव-भरा
  सुकुमार-रुचि-र्नवकाव्य-परा 
  प्रिय-देवगवी-प्रवणा सुखदा
  मम गीतिरियं कमनीय-पदा 
            (प्रास्ताविकम्-पृ.१६)
  
   गीर्वाण-वाणी-नीराजनार्थं
    प्रस्तूयते मे गीत्यावलीयम् 
    विस्तारयन्ती कान्ता यथार्थं
    किञ्चिद् विशेषं तत्त्वं स्वकीयम्   
          (प्रास्ताविकम्१२पृ.१७)

मातृगीतिकाञ्जलिःकाव्यस्य विषयचर्चा : 

   पञ्चविंशति-गीतिका-संवलितस्य अस्य काव्यस्य प्रथममर्घ्यं वाणी-गीतिका” । कविना भारतीय-साहित्य-परम्परानुक्रमेण मङ्गलाचरण-रूपे ग्रन्थारम्भे पूजितास्ति विद्यादेवी सङ्गीत-कलादेवी सरस्वती । कविः एवं प्रस्तौति
        कवि-जननी त्वं  शतदल-निवासिनी,
         भव-शमनी त्वं   सुविमल-सुवासिनी  
                  (वाणी-गीतिकापृ.२१)

    अस्मिन् काव्ये मातृगीतिकाविश्व-गीतिकाजीवन-गीतिकापुरुषोत्तम-गीतिकाप्रबोध-गीतिकानारी-गीतिका,प्रणयिनी-गीतिकाप्रणयि-गीतिकाविभु-गीतिकाशिशु-गीतिकानटराज-गीतिकाशक्ति-गीतिकासमय-गीतिका,कलाकर-गीतिकाअभिज्ञानगीतिकाशिवसङ्कल्पगीतिकागायत्री-गीतिकाभारत-भारती-गीतिकाकवि-गीतिका,गीता-गीतिकासङ्गीत-गीतिकादशरूपगीतिकानववर्ष-गीतिकादेशगीतिका च संवलिताः । प्रत्येक-गीतिकायाः अन्ते गान-विषयिणी ताल-लयादि-सूचना प्रदत्तास्ति । जीवनस्य विविध-विषयाः अत्र सन्निवेशिताः । गीतिकानां नामानुसारमेव वर्ण्य-विषयाः सङ्केतिताः सन्ति । 

   आधुनिक-संस्कृते प्रसिद्ध-गीतिकविना आचार्य-श्रीनिवास-रथ-महोदयेन मातृगीतिकाञ्जलिः काव्यस्य विषये अभिमतम्प्रदत्तमस्ति । विदग्धसुलभैः स्वप्रणीतैः श्लोकैः सह तस्य गद्य-पङ्क्तिः विशेषेण प्रणिधेया । तस्य मन्तव्यस्य कियदंशः एवम्,
  संस्कृत-नवगीति-रचना-कविना श्रीहरेकृष्ण-मेहेरेण मातृगीतिकाञ्जलिरिति प्रकाशतामानीयते पञ्चविंशति-गीतिकालङ्कृतः स्वरचित-गीतिका-काव्यसङ्ग्रहः  सङ्ग्रहेऽस्मिन् कवित्वबोध-बन्धुरा गीतिका विविधविषय-भासुरा दीप्यन्ते  भारतीय-कवितासु गीतिकाव्य-परम्परा भक्ति-रसायनभूता वितनोति समेषामानन्दम्   प्रस्तावना-पद्येषु    “गीर्वाण-वाणी-नीराजनार्थं प्रस्तूयते मे गीत्यावलीयम्” इतिस्वयं विनिवेद्य कविराशास्ते,
          भवतु गौरव-सौरभ-भास्वरा
          विजयिनी मम देश-परम्परा ’ इति 
मातृगीतिकाञ्जलि-पद्येषु परम्परानुगतापि नूतन-पद-रचना-शक्तिः सुतरां प्रीणाति 
        रवि-सङ्काशः
         स्वयम्प्रकाशः,
         संसरणे त्वमनन्ताकाशः ’ इति
         अबलं सबलं
         शुष्कं सजलं
         स्वैरं कुरुते सरलं वक्रम् ’ इति  वा
 सुव्यक्तमुररीकुरुतः  सुललित-पदक्रम- कमनीयताम्   (अभिमतम्पृ.)

हरेकृष्ण-मेहेरस्य कवित्व-विषयेऽपि आचार्यरथ-महाभागस्य मन्तव्यं प्रणिधेयम् 
         आयुष्मता हरेकृष्णेन मन्ये कवित्वबीजरूपः संस्कारविशेषः कुल-परम्परयार्जितः  यतोऽस्य पितामहः श्रीमनोहरमेहेर-नामाऽजनि सरस-भणितीनामाकरः कविः कविताश्रित-कीर्त्तिः  तद्वदेवास्य जनयिता श्रीनारायणोऽपि कवि-पदवीमध्यास्तेऽनितर-साधारणीम्  अथच केचनात्र कुल-परम्पराधिगत-संस्काररूपेण कवित्व-बीजभूतां  शक्तिं  मन्यन्ते । ते तु देवता-प्रसाद-जन्यमदृष्टमेव कवित्वशक्तिकारणमिति  तदात्मक एव संस्कार इति स्वीकुर्वन्ति  यथातथा वा भवतु  उभयथाऽपि प्रतिपद्यत एवात्र कवयितरि संस्कारवत्त्वम्  तत्रापि सुरवाणी-शरणोऽयं प्रस्तौति मातृगीतिकाञ्जलिं बहुतराभ्यास-व्युत्पत्ति-लभ्यम्  तथा ,
        कवित्वं जायते शक्ते-र्वर्द्धतेऽभ्यास-योगतः 
          अस्य चारुत्व-निष्पत्तौ व्युत्पत्तिस्तु गरीयसी 
इत्युक्त-दिशा वाग्देवता-प्रसादात् कालक्रमेण चारु चारुतरं  सम्पत्स्यते संस्कृत-कवितावनी-कृतपदस्य आयुष्मतो हरेकृष्णमेहेरस्य काव्यमित्याशास्महे  निबद्धाञ्जलिः कविरयं सदाशिषा योजयितव्यो भवति भावुकै-र्भावकैश्च  भूयश्च,
  श्रीहरेकृष्ण-मेहेर-रचितो गीतिकाञ्जलिः 
  भद्रं वितनुतां लोके तनुतां  कवे-र्यशः 
इति शम् ”    (अभिमतम्पृ.)

   पुनश्च मातृगीतिकाञ्जलि-काव्यस्योपरि आचार्य-राजेन्द्रमिश्र-महोदयेन प्रस्तुतायां  पाण्डित्य-पूर्णायां दीर्घलेखायां भूमिकायां गीतितत्त्वस्य विशदं विवेचनं विलोक्यते । गीतेः संज्ञा-विचारणा-प्रसङ्गे तेन सामवेदादारभ्य महाकविकालिदास-शूद्रक-राजशेखर-आनन्दवर्धन-अभिनवगुप्त-प्रमुखैसुकवि-जनैः समीक्षकप्रवरैश्च प्रसङ्ग-क्रमेण प्रतिपादितानां गीति-गीत-गान-गेय-शब्दानां सविस्तरमलोकपातः दृश्यते । गीतिकाव्यस्य स्वतन्त्रा संज्ञा यद्यपि केनचित् पूर्वविदुषा न निरूपितातथापि आचार्य-मिश्रेण पूर्वसूरि-कविभिः कृतानां गीत-विषयक-श्लोकानां विचारणा-पूर्वकं तन्मध्यात् गीतिकायाः निर्यास-रूपा संज्ञा समुद्भाविता । प्रस्तुत-गीतिकाव्योपरि भूमिकायां मन्तव्यम् एवमस्ति आचार्य- अभिराज-राजेन्द्रमिश्रस्य,      
     सुप्रथित-यशसो मेहेर-कवेरन्यतमा काव्यकृति-र्मातृगीतिकाञ्जलि-नाम्नी सम्प्रति प्रकाश्यते  गीतिकाव्येऽस्मिन् पञ्चविंशति-मितानिललित-ललितानि गीतानि वर्त्तन्ते विविध-विषयीणियानि पाठं पाठं रसोद्रेक-मुकुलितं जायते सहृदय-मानसम्   * सरल-सरलै-र्भाव-प्रतनन-क्षमैः पदैः इमा गीतिका गेयत्वं मनोहारित्वं लालित्यं भावान्वितत्वं चेति पूर्वोल्लिखित-गीतवैशिष्ट्यजातं सम्यक्तया बिभ्रतीतिसचेतस एव प्रमाणम्  मौलिक्यो भावनाः प्रायेण सर्वास्वेव गीतिषु समुपलभ्यन्ते   (भूमिकापृ११-१२)

    मातृगीतिका’ अस्य काव्यस्य द्वितीया गीतिः । रूपक-ताल-गान-बद्धायामस्यां वर्णितास्ति भारतमातु-र्महनीय-गुणावली । अस्याः पङ्क्तिरेका  समास्वादनीया

जयतु जननी जन्मभूमी  
                  भव्य-भुवनं भारतम्,
विजयतां नो वन्दनीयं
                   सुन्दरं धामामृतम्  (ध्रुवम्)                                                 
बिभर्ति भूति सम्पदम्,  राष्ट्रमिदं हि शं-पदम्,
वैरि-लोचन-बाष्पदम्,   सत्कलाया आस्पदम्   
सांस्कृतिक्या एकतायाः  पुञ्जिता सञ्जीवनी,
मङ्गलमयी  रङ्गललिता  निखिलसुखदा लेखनी 
    प्रेम-जगतां  जैत्र-गीतं  विबुध-हृदये झङ्कृतम्.
    विजयतां नो  वन्दनीयं  सुन्दरं धामामृतम्,
                      भव्य-भुवनं भारतम्   (मातृगीतिकापृ.२५)

    जीवन-गीतिकायां मानवं प्रति उद्बोधन-समेतं कविना जीवनस्य समुज्ज्वल-दिशां प्रति आलोकपातः कृतः । नैसर्गिक-विभावादीनां शिक्षणीय-तत्त्वानि अस्माभिः कृते आहरण-योग्यानि भवन्ति इति कवेर्मतम् । मानवतायाः आत्मिकं सम्बन्धं दर्शयन् कविः कथयति

   पश्य मधुमयं विश्वमीश्वरं
            प्रीतिं शान्तिं हृदि सर्वेषाम्,
   साधय सारं परोपकारं
            लभस्व कीर्त्तिं सफल-सुवेषाम् 
        मानवतायाः  कलय महत्त्वं
        चिरन्तनं परिचिन्तय तत्त्वं
            सकलात्मनि सद्भावनम् 
   जीवनं सुन्दरम्सुन्दरं तनु तपोवनम्  
                       (जीवन-गीतिकापृ.३३)

   सङ्गीत-कलाप्रियः कविः सङ्गीत-विषयेऽपि न नीरव-मुखः । समग्र-विश्वब्रह्माण्डे क्षुद्रकीटात् मनुष्यं यावत्निसर्गस्य सर्वविभावेषु ब्रह्मनादस्य परिव्याप्तिं प्रतिपादयति कविः । यथा

          विधातुः प्राङ्गणं  
                     विततं सङ्गीतमयम्     
           प्रकृत्याः प्रतिकणं 
                    नियतं युत-ताल-लयम्  (ध्रुवम्)                                            
       पल्लविनी प्रफुल्ल-कुसुमा वल्लरी,
        गति-मन्दं  नृत्यति   छन्दः-सुन्दरी 
         सुनिनदत्-कङ्कणं  
                   स्फुट-भाव-कलाभिनयम् 
         प्रकृत्याः प्रतिकणं
                   नियतं युत-ताल-लयम्,
                 विततं  सङ्गीतमयम्      
                  (सङ्गीत-गीतिकापृ.१०१)

  पुरातन-नूतन-मौलिक-रूपकल्प-योजनया दाम्पत्य-प्रणयस्य समङ्कितमस्ति मनोज्ञ-चित्रं प्रणयि-गीतिका’ प्रणयिनी-गीतिका’ चेति गीति-युगले । पद्यमेकं प्रस्तूयते यत्र प्रणयी प्रणयिनीं प्रति स्ववचनं विविध-रूपकल्प-माध्यमेन प्रकाशयति, 
  लीला त्वम्लोला त्वम्
   प्रणय-प्रणीत-दोला त्वम्  (ध्रुवम्)
        ऋक् त्वमसि साम-शोभना,  
        ध्वने-र्मञ्जुला व्यञ्जना 
        मम मर्मोद्गारस्य वा,   
        विभाविता कविता नवा 
        प्रियाभिलाषा         मधुरा भाषा  
           भावाश्लिष्ट-निचोला त्वम् 
           लीला त्वम्लोला त्वम् 
                  (प्रणयि-गीतिकापृ५४)

   अस्माकं भारतवर्षस्य प्राकृतिक-वैभव-सौन्दर्यवर्णन-समेतं देशात्मबोधकतां दर्शयन् कविः देश-गीतिकां प्रस्तौति । अत्र लालित्य-माधुर्यपूर्ण-शब्द-संयोजनायां पद्यमेकमुदाहरण-स्वरूपम्,
       अम्बुधि-विधौत-सुमधुर-चरण-विलासा,
        गङ्गा-सलिले  सलील-सुललित-हासा 
        कुसुमारामे  रसभर-सुरभि-समीरा,
        तरुवर-पुञ्जे  रञ्जित-मञ्जु-शरीरा 
       विहङ्ग-ताने                 मङ्गल-गाने
              श्यामल-शस्या विजयते 
         भारतमाता परम-नमस्या विजयते 
       स्वतन्त्रताया                रण-वीराणां
            सफल-तपस्या विजयते  (देशगीतिकापृ.११३

मातृगीतिकाञ्जलिकाव्योपरि  मन्तव्यानि 

    काव्यमिदं संस्कृत-साहित्ये प्रतिष्ठितानां कतिपयेषां कवि-समीक्षक-जनानां मानसं हरति, आन्तरिकं प्रमोदं सरसतां च वितरति । अस्मिन् प्रसङ्गे विदुषां मन्तव्यानि उल्लेखनीयानि । पुरी-स्थितस्य श्री-गन्नाथ-संस्कृत- विश्वविद्यालयस्य पूर्वतन-कुलपतेः प्रथित-यशसः ज्ञानपीठ-पुरस्कार-विजेतुः आचार्य-डॉ.सत्यव्रत-शास्त्रि-महाभागस्य मन्तव्यमत्र प्रणिधेयम् :
     “भवत्-प्रणीतं मातृगीतिकाञ्जलि-ग्रन्थमवापं परं  तद्वाचनेन परितोषम्  सरलः सरसश्च भवतां वाङ्-निष्यन्दः  अतीव ललिता पद-शय्याऽर्थगौरव-संवलिता  सर्वथा साधुवादार्हा भवन्त एतद्-ग्रन्थ-रत्न-प्रणयनेन  भवतां सर्वविधं मङ्गलमनुध्यायन् विरमाम्यहं सुर-सरस्वती-समाराधनैकव्रतः (शास्त्री सत्यव्रतः)
   
  उत्तरप्रदेश-मैनपुरी-स्थितस्य लब्धकीर्त्तेः प्रणव’ इत्याख्यस्य कविवरस्य आचार्य-इच्छारामद्विवेदि-महाभागस्य मन्तव्यमेवम् : 
    “लब्धो मया तत्रभवतां मातृगीतिकाञ्जलिः’  भाव-सौगन्ध्य-निर्भरोऽयमञ्जलि-र्नूनमेव संस्कृत-वाङ्मय-श्रियं पुष्णातीति मे मोदावहम् । रागबद्धताऽस्याञ्जलेः परागमिवानुरागं वर्द्धयिष्यति विदुषामिति मे मतिः ।   आगामिनि काले तत्रभवतामयं पद्य-प्रकल्पो बहुषु गीतिकाव्येषु स्वीयां वैशिष्ट्य-विच्छित्तिं  प्रमाणयिष्यतीति मे द्रढ़ीयान्  विश्वासः 

 भुवनेश्वर-स्थितस्य  कविप्रवरस्य एस्सुन्दरराज-महोदयस्य  मन्तव्यमित्थम् : 
     “मातृगीतिकाञ्जलि-नाम्न्याः भवदीय-गीति-कविता-पुस्तिकायाः प्रति-र्मया लब्धाप्रीत्या प्रतिगृहीता   संस्कृत-गीतिकवितायाः उत्सभूतः खलु उत्कल-प्रदेशःयत्र महाकवि-जयदेवस्य गीतगोविन्दं यदेव संस्कृतवाङ्मये प्रथमं गीतिकाव्यमिति वक्तुं शक्यतेतत् प्रणीतम्,भगवते श्रीजगन्नाथ-देवाय सादरं समर्पितं   * * 
भवतां संस्कृत-रचना सरलासरसासालङ्कारा सुवर्णमय-मूर्त्तिश्च राराजते व्याकरणानुगुणमपि रचितमिति भवतां काव्यस्य उत्कर्षः  गीतिकाव्यानि यानि आधुनिक-काले कविभिः संस्कृते विरच्यन्तेतानि प्रायशःव्याकरण-त्रुटि-पूर्णानि  एतद्-दोषमुक्तं भवतां काव्यं विशिष्य प्रशंसांभवन्तोऽपि विशिष्य अभिनन्दनमर्हन्ति 

   दिल्लीतः प्रकाशितायाः अर्वाचीन-संस्कृतम्-पत्रिकायाः मुख्य-सम्पादकस्य प्रसिद्ध-कविवर्यस्य आचार्यडॉरमाकान्त-शुक्ल-महोदयस्य  मन्तव्यमपि दर्शनीयम् :
    डॉहरेकृष्ण-मेहेरः  मातृगीतिकाञ्जलिरिति आधुनिक-संस्कृतगीतिकाव्य-सङ्ग्रहे मात्रिक-छन्दोभिः अन्त्यानुप्रास-निर्वाह-पुरस्सरं पञ्च-विंशति-मितानि गीतानि प्रस्तौतियानि गातुं तेन ताल-लययोरपि निर्देशो गीतान्ते कोष्ठकेषु दत्तः  एतेषु गीतेषु प्रथमं गीतं वाणी-वन्दनात्मकमस्ति  द्वितीयं  भारतमातुर्वन्दन-परमास्ते  द्वितीयस्य गीतस्य शीर्षकं मातृगीतिका वर्त्तते  
अस्मिन् गीते मातृ-शब्दस्य प्रयोगो विहितः कविनायथा – 
एक-मातुः सुताः सर्वे भ्रातृसाम्यं सत्कृतम्
विजयतां नो वन्दनीयं सुन्दरं धामामृतम्
भव्यभुवनं भारतम् । 
मन्येग्रन्थस्य नामकरणे द्वितीया गीतिकैव हेतुः  पुनश्च गीतिका मात्रा-च्छन्दोभिः प्रणीता,  इयमपि व्यञ्जना भवति   गीतिकासु भारत-गौरवंनारी-महिमात्र्यम्बक-यजनंगायत्री-गानं कलाकार-प्ररोचना इत्येते भावाः साक्षात्कर्त्तुं शक्यन्ते 
                                              (अर्वाचीनसंस्कृतम् २४/अक्टोबर २००२).

 बिहारप्रदेशस्य आरातः प्रकाशितायाम् आरण्यकम्’ इति (सितम्बर-१९९९शोध-पत्रिकायां समीक्षकवरेण डॉ.सुशील-कुमार-प्रधान-महोदयेन काव्योपरि प्रदत्तं मन्तव्यमित्थम् :
   साहित्यरचना-शोधलेख-प्रसिद्ध-ग्रन्थानुवादादिषु लब्ध-ख्यातिना अर्वाचीन-संस्कृत-गीतिकारेषु अन्यतमेन हरेकृष्ण-मेहेरेण विरचितमिदं गीतिकाव्यं मातृगीतिकाञ्जलिः * *  
प्रत्येकस्यां गीतिकायां नूतन-पद-रचना तथा  पद-क्रमस्य  कमनीयता  सुतरां मनोहारिणी विद्यते सर्वासु गीतिषु कवेः मौलिकं चिन्तनं परिदृश्यते  भावानुकारिणी भाषा सर्वथा व्याकरण-नियम-संयमिता  सन्तुलिता चास्ति    प्रतिगीति  अन्ते केन ताल-लयेन परिवेषणीया इति कविना सन्निर्दिष्टा ।  तीव्रा-त्रिताल-झप-रूपक-दादराद्याः द्वारा  कवेः गीतस्य शास्त्रीय-ज्ञानं लक्ष्यते   भावे सहजताभाषायाः 
प्रवाहः,  पदेषु कमनीयता  एतस्य गीतिकाव्यस्य सहजं वैशिष्ट्यम्  
एवं  विश्वगीतिकया समष्टिगत-कल्याण-भावनायाः उद्रेकः सहृदय-हृदयाह्लादकरः   
जीवन-गीतिकायां जीवनस्य यत्  सौन्दर्यं गाम्भीर्यं  प्रतिपादितं तद् विलक्षणमेव 

 लब्धयशसः ओड़िआ-लेखक-समालोचकस्य डॉहेमन्तकुमार-दास-महोदयस्य मन्तव्यम् :
                                         "मातृगीतिकाञ्जलिः का भाषा-सारल्यशब्दगुम्फन की अपूर्व पाटवतासाङ्गीतिक माधुर्य तथा  आलङ्कारिकता का सूक्ष्म शिल्प मेरे-जैसे एक सामान्य पाठक को भी रस की दोला में दोलायित कर आत्मविस्मृत कर रहा है   दार्शनिकता के साथ आध्यात्मिकता का कलात्मक  समन्वय  कविताओं को भाव-गम्भीर बनाता  है  कविता यदि अनुभूति का आलेख्य है  तो इस काव्य में उसका रसोत्तीर्ण रूप ही देखने को  मिलता है  आप जात-कवि हैं  कवि-कर्म के सहजात कवच-कुण्डल के साथ  आपका जन्म हुआ है  देश-विदेशों में इसके मर्म की उपलब्धि  करने हेतु रसज्ञ पाठकों का अभाव नहीं होगा ”   

 आधुनिक-कवि-कथाकारेण डॉ.बनमाली-बिश्वाल-महोदयेन त्तं मातृगीतिकाञ्जलि-गीतिकाव्योपरि मन्तव्यमेवम् : 
    सुकवि हरेकृष्ण मेहेर आधुनिक संस्कृत गीतिकाव्य परम्परा में अपने लिये एक स्वतन्त्र एवं मर्यादापूर्ण स्थान बनाने में सफल हैं । मातृगीतिकाञ्जलिः की रचना में उनकी शैली दूसरे कवियों की शैली से भिन्न है । इसमें वैकल्य होनेका कोई कारण नहीं  दीखता । परम्परा के आधार में उद्भावित नव्य मौलिक छन्दों के प्रयोगों से विरचित कई सुन्दर गीत इस संग्रह को विमण्डित कर रहे हैं । विभिन्न ताल एवं लययुक्त ये गीत शास्त्रीय लघुसङ्गीत शैली में सर्वथा परिवेषणयोग्य हैं । उल्लेख्य है कि कवि श्रीमेहेर स्वयं एक गीतिकार एवं स्वर-संयोजक भी हैं । मातृगीतिकाञ्जलिः की मधुर पदावली प्रसाद-गुणोपेत वैदर्भी-रीति-सम्पन्न है । जटिलता एवं दुर्बोधता से कोसों दूर इस सुमञ्जुल काव्य का भावानुकूल ललित-पदन्यास-जन्य अपूर्व चमत्कारिता, सांगीतिक माधुरी पाठकों को अनायास आकर्षित, आह्लादित एवं विमुग्ध करने में समर्थ है ।
(मितं च सारं च : हरेकृष्ण-मेहेर की मातृगीतिकाञ्जलिः/ विद्वानों की सारस्वत प्रतिक्रिया) 
   [दृक्-१७, २००७, पृ.१२९-१३१]   
आधुनिक-संस्कृत-साहित्ये प्रख्यात-यशसः कवि-समीक्षकस्य डॉहर्षदेव-माधवस्य मन्तव्यमीदृशम् :
             आधुनिक-संस्कृत-वाङ्मये गीतिकाव्यानां सर्जनं लब्ध-प्रतिष्ठमधुना  डॉराजेन्द्रमिश्र-श्रीनिवासरथ-हरिदत्तशर्मा-राधावल्लभत्रिपाठी-पुष्पादीक्षित-रमाकान्तशुक्ल-हर्षदेवमाधव-भास्कराचार्यत्रिपाठीइच्छारामद्विवेदी  
इत्यादिभिः प्रमुखैः संस्कृत-कविभिः नवनवोन्मेषयुक्ता गीतयो रच्यन्ते  
श्रीहरेकृष्ण-मेहेरोऽपि नवगीति-रचना-निपुणः सङ्गीतज्ञः सुकविः   पञ्चविंशति-गीतिरचनालङ्कृतोऽयं 
मातृगीतिकाञ्जलिः इत्याख्यः काव्य-सङ्ग्रहो  केवलं नव-नवीनेषु विषयेषु बद्धानि गीतानि 
प्रस्तौतिअपितु  वाचकानां मनांसि जयति  अत्र भक्ति-श्रद्धा-प्रणय-पूजा-साहित्य-साहित्यकारस्तुतिविश्व-नारी-जीवनादिषु मधुर-मधुरेषु भावेषु कवेरभिव्यक्तिः स्वभाव-कोमला रस-प्रवाह-माधुरीमयी 
भवति तरला प्रवाहिता *
कवित्वं स्पन्दते तस्य सरलासु शब्दावलीषु  क्वचित् चिन्तनमपि स्फुरति   यथा
सञ्चर धर्मे कर्मणि योगे,
किञ्चनापि मणि-काञ्चन-योगे,
    कुरु नव-नवमुद्भावनम्,
जीवनं सुन्दरं सुन्दरं तनु-तपोवनम्  
कविना गीति-रचनासु सङ्गीत-तत्त्वमपि संरक्षितम् ”  
    (नखदर्पणःपृ५६-५७)  

सौन्दर्य-विवेचनम्  :
  सौन्दर्य-सन्दर्शनम् इति काव्ये कविना हरेकृष्ण-मेहेरेण सौन्दर्यस्य तत्त्वं स्वरूपं सौन्दर्यानुभूतिःसौन्दर्यस्य अनुभवी चेत्यादयो विषयाः विशदं प्रतिपादिताः । वस्तुतः मानवस्य रुच्यनुसारमेव सौन्दर्यमनुभूयते । क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः (शिशुपालवधम्/१७इति माघ-कवेः उक्तिः सुविदिता । कविना  मेहेरेण   सत्यस्य   शिवस्य     च समावेशः  सुन्दरेण  सह  विहितः ।  कविः निगदति  यत्  अज्ञ-जनस्य  कृते  सौन्दर्यं रुचिकरं न भवति ।
         सत्यं शिवं सुन्दरमत्र लोके   
                     प्रसिद्धमेतत् त्रितयं विभाति   
         जानाति नित्यं खलु तत्त्वदर्शी   
                    नाज्ञाय किञ्चित् स्वदते मनोज्ञम्  (सौ.)
    
व्यक्त्यनुसारं  सौन्दर्यानुभूतिः  स्वतन्त्रा भवति इति कविः मतं पोषयति ।  मम तव अन्यस्य च नयनेषु सौन्दर्यानुभूतिः कविना वर्णितास्ति एवम्,
         मन्नेत्रयो-र्यत् प्रतिभाति सुन्दरं   
               त्वन्नेत्रयोस्तन्  भवेत् तथाविधम् 
        यदन्य-नेत्रे रुचिरं प्रपश्यत-  
              स्तथैव नैतन् मम ते  नेत्रयोः  (सौ.)

       परन्तु किञ्चिद् भुवि वस्तु विद्यते 
                 विचित्रमेवं  रचितं विधात्रा 
        यद् वै जनानां जगतां समेषां   
              नेत्राणि पश्यन्ति सदैव सुन्दरम्  (सौ.) 

 सौन्दर्यं बाह्यमाभ्यन्तरं चेति द्वि-प्रकारकं भवतीति कवेर्मतम् । अन्यत्र सौन्दर्यम्’ इति कवितायां कविः शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध-माध्यमेन सौन्दर्यं प्रतिपादयति ।  यथानायिकायाः रूप-वर्णनाप्रसङ्गे कविः व्यतिरेकानुप्रास-प्रभृत्यलङ्कार-योजना-समेतं सपदलालित्यं  माधुर्यसमन्वितं वक्ति,
         
         नेत्र-निर्जित-नीलोत्पलायाः
          द्युति-पलायित-चपलायाः
          कान्तायाः कान्त-कुन्तलायाः
          समलङ्कृत-भूतलायाः
          विलोक्य लपनमतन्द्रो धृतम्लानिः,
          सलज्जं जलद-जाल-मध्ये
          साभिमानमात्मानं गोपायते
          वराको राकाजानिः,
          कलङ्क-लेखाङ्कित-कलेवरः
          कलितामृत-किरणोऽपि कलाकरः  (सौन्दर्यम्)   

सामाजिक-सांस्कृतिक-विवेचनम् 

    जीवनालेख्यम् इति काव्ये जीवनस्य विविध-तत्त्वानि वर्णितानि । आधुनिकता-नाम्ना कथं विज्ञापन-प्रचारणादिकं प्रदर्शनं चलतिसारासारयोः महत्त्व-विवेचना-सहितं कविः वर्णयति  
 युगमिदं प्रदर्शनस्य,
 आत्म-डिण्डिम-वादनस्य,
 निम्न-मानस्यापि बहुमान-प्रतिपादनस्य,
 दग्धाननस्यापि प्रसाधन-लिप्त-दीप्त-वदनस्य,
 शून्य-गर्भस्यापि बाह्य-पूर्णतापादनस्य
 शुष्क-वस्तुनोऽपि सरसास्वादनस्य,
 निज-दोषाच्छादनस्य जनता-प्रसादनस्य
 आधुनिकता-नाम्ना रिक्त-मानसोन्मादनस्य   
(प्रदर्शनम्), [संस्कृतमञ्जरी,अक्टोबर २००८, पृ.२२] 

अस्य काव्यस्य जीवन-सम्बन्धिनी एका पङ्क्तिः कवेः मुक्तच्छन्दसा प्रणीता इत्थम्,
  जीवनं नाम विहङ्गमः
  अवसाद-शून्याङ्गो नीड़-गृहङ्गमः,
  हृदय-व्योम्नि विहरति
  प्रसारित-पक्षः स्वलक्ष्यं प्रति,
  वितरन् मञ्जुलां गुञ्जित-काकलीं
  मधुर-रीत्या गीत्यावलीं
  समाह्लादित-स्थावर-जङ्गमः
  प्रपञ्चित-पञ्चम-स्वर-सङ्गमः  (जीवनदशकम्)          
      [संस्कृतमञ्जरीजुलाई-२००५पृ.२२]

   भारतीय-संस्कृतौ समुद्घोषितं सत्यमेव जयते नानृतम्’ (मुण्डकोपनिषद्--। पुराणकाव्यादिषु सत्यासत्ययोः सङ्घर्षे सत्यस्य विजयः सर्वत्र प्रतिपादितो वर्त्तते । कविना हरेकृष्णमेहेरेण सत्योपरि नैकाः कविताः रचिताः । ज्योतिःस्वरूपं वह्निसमं सत्यं दर्शयन् मौनव्यञ्जना-काव्ये कविः कथयति,
     असत्यस्य विजयो मायाच्छन्नः
     सत्यमेव धर्मश्चिरन्तनः 
     सर्वोपरि परिणामे
     सत्यमेव जयते द्वन्द्व-ग्रामे संग्रामे,
     जयति ज्योति-र्यथा
     निरस्त-तमःस्तोमम्,
     अधःकृतोऽपि कृशानुरूर्ध्वगामी सर्वथा
      कदापि भजते विलोमम्    (सत्यम्)  
        [लोकभाषासुश्री:, अगस्त-२००५]

   मौन-व्यञ्जना इति कवितायां कविः मौनभावस्य नीरवतायाः निगूढ़त्वं विशेषत्वं च वर्णयति उपमा-यमकानुप्रासादिभिः सार्धम् । यथा,
    कदाचित् स्वल्प-कथनेनापि
     प्रकाशतामभ्येति बह्वभिप्रायः,
     यथा व्यञ्जना-रञ्जिता अभिधा ।
     कदाचिद् वचनोच्चारणं विनापि
     आन्तरिकाशयः प्रकाशतां याति बहुधा ॥  

     कदाचिद् वाचालतयापि
     समुच्चारितै-र्बहुवचनैः
     नाभिव्यज्यते मर्म-भावना सुविशदम् ।
     तूष्णींभावोऽपि कदाचित्
     अभिव्यनक्ति मुखरताम् ।
     कदाचिद् मुख-रताऽपि मुखरता
     नीरवतां भजते
     आभ्यन्तराभिप्रायं प्रकाशयितुम् ॥    (लोकभाषासुश्रीः, फेब्रुआरी-मार्च २००६)

  सम्प्रति प्रचलितानां हाइकु-सिजो-तान्का-नामकानां विदेशीय-च्छन्दसां प्रयोगोऽपि कवि-मेहेरेण कृतोऽस्ति हासितास्या वयस्या  इति काव्ये स्वनाम्ना यथार्थ-शीर्षके । अत्र (---वर्णात्मकेनहाइकु-नाम्ना छन्दसा रचितायाः कवितायाः एकमुदाहरणम्,  
          वामनी काया,
           विधुं लब्धुमुत्थिता,
           घर्माक्ता भ्रष्टा  (वामनी)

  कवि-मेहेरेण (-----वर्णात्मकेनतान्का-छन्दसा रचिता सामाजिक-समस्या-परका एका पङ्क्तिः प्रस्तूयते,  
          दैन्यदा वन्या
           अधन्या गृहशून्या 
           द्रविण-बन्धः,
           कर्मिणां निर्मीयते
           प्रवहत्यर्थधारा   (वन्या) 

  भावना इति कवितायां भारतीय-संस्कृत्याः शाश्वत-मूल्यबोधं दर्शयन् कविः देशभक्तिं सूचयति । उदाहरण-स्वरूपम्, 
                 या वैदिकैरार्यवरै-र्महस्वती  
                    मनीषिभिः सत्प्रतिभां वितन्वती 
              प्रकीर्त्तिता विश्वजनीन-दर्शना  
                    मान्यैव सा मानवतेति भावना  

              उदात्त-कण्ठै-र्भुवि विश्वबन्धुता  
                     विधीयते या नितरां जनै-र्नुता 
              महानुभावा महनीय-चेतना   
                     सनातनी सैव विभाति भावना 
                               (भावना)   [संस्कृतमञ्जरी१०/२०००]

   जातीय-संहति-प्रतिष्ठार्थं कविः मतं पोषयति यत् भारतस्य निवासिनः केवलं नागरिकाः न भवेयुःअपितु भारतीय-भाव-सम्पन्नाः सन्तः मातृभूमिं प्रति भक्त्तिपराः स्युः । कवि-र्वदति,
              किं चेष्टकै-र्बहुधनैरुपलैः श्रिया वा
                       नात्मीयता यदि गृहे परिवार-भावा 
               किं देश-नागरिकता कुरुते धृतासना
                       नेष्टा यदि स्वहृदि राष्ट्रियतेति भावना ?  (सूक्ति-कस्तूरिका)

   जनेषु परस्परमविश्वासं  पारिवारिक-शान्तिभङ्गं नारी-निर्यातनं दुर्बलानामुपरि दुष्कर्मात्याचारादिकं च वीक्ष्य कविः साम्प्रतिकसमाजस्य प्रदूषितं कलुषितं पर्यावरणं सूचयति । दुःशासनादि-चरित्राणां कुकर्माणि दृश्यन्तेकृष्णादयः रक्षकाः न लभ्यन्ते इति सखेदं कथयति
     अद्यापि विद्यन्ते मन्थराः
     दाशरथये दर्शयितुं काननस्य पन्थानम् 
     कैकेय्यो विवेकिनस्तत्पराः
     हन्त अर्हन्ति बहुमान-स्थानम् 

     अद्यापि भ्रमन्ति रावणाः
     बहु-वैदेही-हरण-प्रवणाः 
     कुर्वन्ति द्रुतमुपद्रवं जयद्रथाः
     पर-दारापहरणार्थं समारूढ़-रथाः 

     बाष्पपूर्णाश्चतुष्पद्यः
     अद्यापि खिद्यन्ते समुपद्रुता द्रौपद्यः 
     शरव्या दुःशासनानाम्
     केश-कर्षण-धर्षण-लालसानाम् 
     भीष्मास्तु तूष्णीकृत-वर्ष्माणो ह्यनुष्णाः
      अपेक्षन्ते कदा रक्षिष्यन्ति श्रीकृष्णाः   
                       (अन्धानुसन्धानम्)  [संस्कृतमञ्जरीअप्रेल्-२००७]

   कविः मातृगीतिकाञ्जलिः’ इति काव्ये नारी लक्ष्मीरूपिणीदेवीस्वरूपा सुगृहिणीप्रेम-स्नेह-ममतामयी इति नारी-गीतिकायां नारी-गौरवं प्रशंसति । परन्तु अन्यत्र खलनायिका-भूतायाः नार्याः निष्ठुरतां प्रति स्वरमुत्तोल्य आक्षिपति । साम्प्रतिक-समाजे यौतुक-धनलोलुपैः निर्दय-श्वश्रूगणैः निर्मम-निपीड़िताः वधूजनाः करुणपरिणतिं लभन्ते इति कविः नारीणां दुर्दशां वर्णयति । यथा
       नारी एव नारीणां हन्त्री
       कम्पते यया शम्पापातिन्या लोक-हृदय-तन्त्री 
       परिणय-वेदिकायां युवत्यः
       यौतुक-ज्वालायामार्जववत्यः
       वलीभवन्ति विवाहिताः
        तयैव सपारुष्यं बहुदूर-वाहिताः ॥ (महिला)  (दृक्अङ्क-११२०१२,, पृ१००)

  पुनश्च साम्प्रतिक-समाजे राजनीतिक-स्थितिं जनतायाः निरीहत्वं च दर्शयन् कविः भ्रष्टाचार-दूरीकरणार्थं जन-जागरणमेव महौषधमिति मतं पोषयति महौषधम्’ इति कवितायाम् । यथा, 
         घोटाला-घोटकाः सत्वरं
         
धावन्ति प्रशस्त-राजमार्गे
         
धूली-धूमावृतं कृत्वा चत्वरं
         
प्रखर-खुरोत्क्षेपणैः पश्चाद्भागे  ॥ 

         दुर्नयो मारात्मक-व्याधीभूय प्रतिक्षेत्रम्
         शनैःशनैः खादति देश-गात्रम्,
         
चेष्टते  नितरां  राष्ट्रस्य
         पङ्गुत्वं विधातुं  गणतन्त्राङ्गेषु ।
        
 वराकी जनता    जानाति
         मुद्रित-नेत्रा  केवलं  दृष्टिं दधाति ॥ 

         जन-जागरणमेव महौषधम्
         कर्त्तुं भ्रष्टाचार-व्याधि-वधम् ।
         
संस्कार-समुच्चार एव महामन्त्रः
         
सुसञ्चालित-जनतन्त्र-यन्त्रः ॥ 
 
                      (महौषधम्) [अर्वाचीनसंस्कृतम्अप्रेल-२००४]

    पुष्पाञ्जलि-विचित्रा इति काव्ये मेहेर-कवेः नाना-रुचि-सम्पन्नानां पद्यानां गीतीनां च वैचित्र्यं लक्ष्यते । अत्र आदौ भारत्याः भारतीय-संस्कृत्याश्च गौरवं प्रशंसन् कविः प्रस्तौति स्वमौलिकच्छन्दसा प्रणीतं गीतम् । 
    विजयतेतराम् ओंकार-भारती,
     संस्कार-भारती 
     शुचि-वर्णम्अन्तःकरणम्,  
     भुवि भव्या प्रतिभा विभास्वती  (ध्रुवम्)

 भारतीयं साहित्य-शिल्प-स्थापत्यादिकं भौगोलिकं सांस्कृतिकं महत्त्वं च प्रख्यापयन् कविः देशात्मबोधकत्वं वर्णयति
   संहति-सूत्रा भारत-पुत्रा मैत्री-भरणे,
   शान्ति-भावना धार्या नियतं पर्यावरणे 
        मातृ-पदे,   मङ्गलास्पदे,
   प्रणति-र्नो नितरां भक्तिमती 
विजयतेतराम् ओंकार-भारतीसंस्कार-भारती     (संस्कृति-गीतिका) [पद्यबन्धाअङ्क-]

   कविना मेहेरेण  स्वीय-मौलिक-नव्य-च्छन्दसा प्रणीतं  पर्यावरण-परकं  हृद्यं पद्यमेकं प्रस्तूयते, 
         शान्ति-मन्त्रो जयतु नितरां  सौम्य-गाने,
          प्रेम-गङ्गा वहतु सुजला ऐक्य-ताने ।
           *
          भातु पर्यावरणममलं दिग्-विताने,
           यातु हिंसा ध्वंसमचिरं सन्निधाने ।
                 अवतु पवनो  मुक्त-गगनं
                 स्वच्छ-परिमल-धौत-सदनं
               दूषणानां  पर्व यातु पराहतम् ।
           प्रीति-मैत्री-बोधना    हार्दिकी  सद्भावना
                 हन्तु सर्वं  वैर-वर्वर-पर्वतम्,
              भातु  सत्यं  सुन्दरं  शिव-सम्मतम् ।
              शाश्वतम्,  प्रकृति-मानव-सङ्गतम् ॥’   (पर्यावरण-गीतिका)

  अन्या एका कविता कुहू-कुहू-कूजनम्’ इति अत्र उल्लेखमर्हति प्रेम-परका पिक-वसन्त-तारुण्य-प्रकाशिका । कविः प्रस्तौति
     कोकिलस्य कुहू-कुहू-कूजनम् ।
     
किं निसर्ग-देव-मन्त्र-पूजनम्  ॥ (ध्रुवम्)
     राग-रङ्ग-मङ्गला  शोभते शुभाङ्गना,
     
भाव-वीचि-चञ्चला  काञ्चनी वरानना ।
     
एहि  रे  !   धेहि  रे  !
     
मानिनी-जनस्य मान-भञ्जनम् ।
     
कोकिलस्य कुहू-कुहू-कूजनम् ॥
   (कुहू-कुहू-कूजनम्)  (संगीतजून् २००५)

  पुष्पाञ्जलि-विचित्रा- काव्यात् एका गलज्जलिका (गजल-गीतिःप्रियमिलनम्’ इति प्रणय-परका उदाहरणीया । नायिका-मुखेन मिलन-विरह-विषयं कविः रागानुकूलं प्रस्तौति । यथा

   प्रिय-मिलनं यदा भवेन् नूनं मे 
   स्वर्भुवनं प्रतीयते न्यूनं मे  ()
   शशि-विरहे कुमुद्वती नो फुल्ला,
   स्वं हृदयं प्रियं विना दूनं मे 
   पिक-विरुते सुमञ्जुलं सञ्जातम्,
   ह्री-सहितं विमोहितं मौनं मे   (प्रिय-मिलनम्) [संगीतसितम्बर-२००४]

  कविः ओड़िशायाः  ऐतिह्यं गौरवं च मधुरं व्यनक्ति  उत्कलीय-सत्कला इति काव्ये । तस्य मधुर-ललितं पद्यमेकम्,
                 शिल्प-कल्पनास्पन्दित-मन्दिर-माला,
                  
अनिन्द्य-रूपा  वन्दित-सुन्दर-भाला ।
                  
निसर्ग-देव्या  रङ्ग-सुविशाल-शाला,
                  
मङ्गल-भङ्ग्या  वाङ्मय-मयूख-जाला ।
                  
मन्दाकिनीव  पुनती नाशित-मन्दा,
                  
संस्कृति-सुरुचा  सञ्चारित-मकरन्दा ।
               
वसुन्धरा सा                    सिन्धु-विलासा 
                        
स्निग्ध-बन्धना महीयताम्  ।
                 
उत्कल-जननी सत्कला-धना महीयताम् ॥  
(उत्कलीय-सत्कला१)

  हरेकृष्ण-मेहेर-कृता स्तवार्चन-स्तवकम्’ इति कृतिः भक्ति-प्रार्थना-वन्दनारूपाणां पद्यानां समाहार-भूता । अत्र श्रीजगन्नाथ-प्रार्थना’ इति कवितायाः श्लोक-युगमित्थम्
शुभं सुभद्रा-बलभद्र-सङ्गतं   
    नमामि नाथं जगतां वरेण्यम्  
ओंकार-रूपं भुवि दारु-दैवतं   
    वेदान्त-वेद्यं महतां शरण्यम्  

मैत्रीं प्रशान्तिं सुखदां चिरन्तनं   
    तनोतु विश्वे तव नाम चिन्तनम्  
आत्मीयता-रूप-रसो महीयतां   
    प्रभो जगन्नाथ ! कृपा विधीयताम्  ॥
(संस्कृत-प्रतिभा, २३/२, २००० - २००१, साहित्य अकादेमी, नवदिल्ली)

 कवेः आयाहि दुर्गे’ इति कवितायाः ललित-मधुरं भावभरितं श्लोकयुग्ममेवम् : 
 आयाहि  दुर्गे !  वरदा महायुधा   
     हे दुष्ट-विध्वंसिनि !  धर्म-धारिणी ।
गङ्गाधरार्धाङ्गि  ! निधेहि मङ्गलं  
     तवानुकम्पा  हृदयं पुनातु  नः ॥

अस्माकमन्तःकरण-प्रदूषणं  
      भस्मीकुरु त्वं तमसां निरासिनी ।
शर्वाणि !  सर्वाणि पवित्रय स्वयं 
      विधाय पर्यावरणं सुनिर्मलम् ॥   (बर्त्तिका’ शारदीय-विशेषाङ्क, २०१२)

   उपर्युक्तेषु  उदाहरणेषु कवि-हरेकृष्णस्य साङ्गीतिकतायाःगीतिकवितायाःमुक्तच्छान्दस-कवितायाश्च मौलिक-परिचयः समुपलभ्यते । एतत् सर्वं दिग्दर्शनमात्रम् । सुधीभिः अन्याः कविताः अनुसन्धेयाः    

कवेः अनुवाद-वैशिष्ट्यम् :   
    
    स्वभावकवि-गङ्गाधर-मेहेर-प्रणीतस्य तपस्विनी’ इति प्रख्यातस्य ओड़िआ-महाकाव्यस्य हरेकृष्ण-मेहेरेण आङ्गल- हिन्दी-संस्कृत-भाषानूदितानां पुस्तकानां  प्रसारणमान्तर्जातिक-स्तरे समुपलभ्यते । अन्तर्जाल-स्थानेष्वपि सर्वं त्रयं दर्शनीयम् । वाल्मीकि-रामायणीयं सीतावनवास-विषयं समवलम्ब्य कृतमिदं महाकाव्यम् । अस्य सारतत्त्वं साहित्य-दर्पणोक्तं महाकाव्य-लक्षण-निरूपणादिकमाश्रित्य निज-भाषया संस्कृतानुवादकेन कविना एवं प्रस्तुतमस्ति,

 तपस्विनी-महाकाव्यं  स्वभावकविना कृतम् 
 गङ्गाधर-मेहेरेण  रङ्गायितं सुवर्णकम् 
 जानकी नायिका यत्र  श्रीराम-सहधर्मिणी 
 सती-शिरोमणी साध्वी पतिव्रता तपस्विनी 
 सर्गा एकादश ख्याताश्छन्दो-रागैरलङ्कृताः 
 ग्रन्थाद्यं प्रार्थना-वस्तुनिर्देशात्मक-मङ्गलम् 
 निर्वासनोत्तरं वृत्तं  रामपत्न्याः प्रकीर्त्तितम् 
 सीतायाश्च तपश्चर्याविभा कवेरभीप्सिता 
 वाणी भावमयी स्निग्धा  प्रधानः करुणो रसः 
 दर्शनीयं  निसर्गस्य  चित्रणं चात्र मञ्जुलम् 
 मौलिकोद्भावना भाति  कवेरत्र स्वतन्त्रता 
 सौरभं भारतीयं   सांस्कृतिकं सुसंभृतम् 
 सीता-चरितमाश्रित्य  विशेषेण विनिर्मितम् 
 वक्तुं हि शक्यते काव्यं  सीतायनमिति स्मृतम्  
 ओड़िआ-मूलभाषायाः  कृतः संस्कृत-भाषया 
 मम काव्यानुवादोऽयं  मोदयतु सतां मनः  
     (प्राक्कथनम्तपस्विनीपृ१०-११)  

अस्य चतुर्थ-सर्गे वाल्मीकि-मुन्याश्रमे उषा-वर्णना विशेषेण लोकप्रिया । पद्यमेकं मधुर-चोखि-रागेण रचितम् (ओड़िआ-मूलम्),
  मङ्गळे इला उषा     विकच-राजीव-दृशा
      जानकी-दर्शन-तृषा  हृदये बहि  
  कर-पल्लबे नीहार-      मुक्ता धरि उपहार 
      सतीङ्क बास बाहार  प्राङ्गणे रहि 
         कळकण्ठ-कण्ठे  कहिला,
      दरशन  दि  सति !  राति पाहिला’    
                      (तपस्विनी/ 

      कवि-हरेकृष्ण-मेहेरस्य स्वकीय-शैल्या  संस्कृतानुवादे तत्पद्यमेवम्
     मङ्गलं समागता सौम्याङ्गना
     उषा व्याकोषारविन्द-लोचना
     वैदेही-दर्शनाभिलाषं वहन्ती स्व-हृदये,
     पल्लव-कर-द्वये
     नीहार-मौक्तिक-प्रकरोपहारं दधाना
     सती-निलय-बहिरङ्गणे विद्यमाना
     अभाषत कोकिल-कण्ठस्वना सूनरी,
     दर्शनं देहि  सति !  प्रभाता विभावरी’    
         (तपस्विनी/पृ९६)

   दशम-सर्गे प्रसङ्ग-क्रमेण महाकाव्यस्य करुण-प्रधानत्वं सूचितमस्ति । ओड़िआ-मूलं पद्यमेवंरूपम्,
           रस-रत्नमय  काव्य-शिखरी,  
           बिराजन्ति य़हिँ  राम-केशरी 
           राबण-बारणरकत-धार,   
           बह झर्झर  निर्झराकार 
          कान्दन्ति,   सिंही कन्दरे रहि   
          दन्ति-दन्ताघातबेदना सहि   (तपस्विनी १०/१८)    
                      
  हरेकृष्ण-मेहेरस्य संस्कृतानुवादे स्वकीय-पद-शैल्या प्रस्तुतं पद्यमिदम्,
   रस-रत्न-परिपूर्णः  काव्य-पर्वतो वर्त्तते,
   श्रीरामचन्द्र-मृगेन्द्रो यत्र विराजते 
   दशकन्धर-सिन्धुरस्य रुधिर-धारा,
   प्रवहति झर्झरं निर्झरिणी 
   क्रन्दति  तद्-गिरि-कन्दरागारा,
   विषह्य दन्ताबल-दन्ताघात-क्लेशं केशरिणी  
             (तपस्विनी१०/१८पृ२१०) 

     अनुवादेऽपि मूलभाव-सुरक्षा-समेता स्वीय- नूतन-पद-संयोजना कवि-हरेकृष्ण-मेहेरस्य प्रतिभायाः मौलिकतां प्रतिपादयति । मुक्तच्छन्दोधारया सह पदेषु व्यवहितम् अव्यवहितं च उपधा-मिलनं नूनं प्रणिधेयमत्र महाकाव्ये । अस्य निदर्शनं प्रोक्तमुदाहरणम् । प्रबन्ध-विस्तर-भयाद् अधिकवर्णनमत्र न प्रस्तूयते ।

उपसंहारः : 

      कविः हरेकृष्ण-मेहेरः साम्प्रतिक-संस्कृत-वाङ्मये विशेषतः काव्य-साहित्ये स्वकीय-काव्यगुण-दृष्ट्या स्वतन्त्र-प्रतिष्ठां लभते । कवेः काव्यानां विषये आलोचनाचक्रेषु गवेषणा-ग्रन्थादिषु च चर्चा कृता उपलभ्यते । कवेः कतिपयाः कृतयः पुस्तकरूपेण प्रकाशिताः सन्ति । नैषध-महाकाव्ये दार्शनिक-प्रतिफलन-विषयकः तस्य शोध-ग्रन्थः नूनं प्रशंसार्हः ।  आधुनिके विज्ञानयुगे अन्तर्जालेषु कवेः कृतीनां लेखाः प्रसारिताश्च  विलोक्यन्ते । संस्कृतभाषायाः तस्याः साहित्ये च आधुनिक-प्रयोगप्रसार-विषयेषु कवेः हरेकृष्णस्य विशिष्टमवदानं विद्यते । तस्य काव्य-कृतिषु पारम्परिकता-सहिता आधुनिक-दृष्टिभङ्गी राजतेनूतनत्वं मौलिकत्वं च दीप्यते । प्राणिजीवनस्य विभिन्नाः समस्याः तत्समाधानादिकाः विषयाश्च  निजस्वमाधुर्यपूर्णमनोहारि-पदावली-माध्यमेन तस्य काव्येषु समुपन्यस्ताः । भारतीय-प्राच्यसंस्कृतेः गौरवं तेषु सम्यक् प्रतिफलितम् ।               
     कवेः हरेकृष्ण-मेहेरस्य बहुमुखी प्रतिभा नूतन-पुरातन-समन्वयेन सम्प्रसारिता लक्ष्यते । तस्य सुकुमार-भव्य-काव्य-कौशलेन कलामयी लीलावती सुरभारती सुतरां सुप्रसन्ना सुदीप्ता च भ्राजते । आधुनिक-संस्कृत-साहित्य-परिधौ तस्य मेहेर-कवेः काव्य-कविताः सफलार्थाः नितरामुपादेयाः सुधीभिः समादरणीयाश्च विभान्ति । 

* * * * 
सहायक-ग्रन्थादि-सूची :

() मातृगीतिकाञ्जलिः (आधुनिकसंस्कृत-गीतिकाव्यम्), डॉहरेकृष्ण-मेहेरः,    
        कलाहाण्डि लेखक कला परिषद्,  भवानीपाटना१९९७.

() तपस्विनी (कवि-गङ्गाधरमेहेर-प्रणीतस्य ओड़िआ-महाकाव्यस्य सम्पूर्ण-हिन्दी-पद्यानुवादः)
        अनुवादक : डॉहरेकृष्ण-मेहेर,    सम्बलपुर-विश्वविद्यालयसम्बलपुर२०००.

() तपस्विनी (कवि-गङ्गाधरमेहेर-प्रणीतस्य ओड़िआ-महाकाव्यस्य सम्पूर्ण-संस्कृतानुवादः)
       अनुवादक:  डॉहरेकृष्ण-मेहेरः,
       परिमल-पब्लिकेशन्स्२७/२८शक्तिनगरम्दिल्ली-७२०१२.

() मातृगीतिकाञ्जलिः -भारत-भारतीर महनीय  उदात्त गान (समीक्षकडॉनबकिशोर-मिश्रः
      ‘’बर्त्तिका’ अप्रेल्-जून् १९९९पृ५०१-५०८दशरथपुरयाजपुरओड़िशा.

() तपस्विनी महाकाव्यम् : हरेकृष्ण-मेहेर   (समीक्षकडॉनबकिशोर-मिश्रः‘’बर्त्तिका
      दशहरा-बिशेषाङ्कअक्टोबर-डिसेम्बर  २०१२पृ१४५०-१४५४याजपुरओड़िशा

(आधुनिकता एवं समीक्षा : कुछ अपनी बातें (लेखडॉहरेकृष्ण-मेहेर)
       दृक् अङ्क-११२०१२ दृग्-भारतीयोजना-इलाहाबाद. 

() अन्धानुसन्धानम् (हरेकृष्ण-मेहेरः), संस्कृत-मञ्जरीअप्रैल्-जून् २००७
       दिल्ली संस्कृत अकादेमी,  नवदिल्ली-

() प्रदर्शनम् (डॉहरेकृष्ण-मेहेरःसंस्कृत-मञ्जरीअक्तूबर-दिसम्बर २००८,  पृ.२२-२४,
      दिल्ली संस्कृत अकादेमीनवदिल्ली-

() जीवन-दशकम्  (डॉहरेकृष्ण